Guys i have been trying to watch it but can't watch more than 2 minutes cuz i am scared i will complete the episode and i will not be able to watch any episodes for the next 6 days.....its been so long since i last felt this way about something....its a 10/10 for me....i will take full 6 days to complete the episode otherwise I will burst into tears. Also...please mark spoilers....dont make this a dangerous place for ppl who have not watched it yet.
I'm literally in love. This is the type of series that made me fall in love with Taiwanese BLs, they've been producing…
Yessss i wrote the exact same thing few days ago...i so agree with u...hopefully we get to see more BL like these. I am the type to like very intense content...i don't like cute fluffy stuff that much...even if i do it gotta be outstanding for me to notice like Cherry magic but this kind of stuff is right up my alley.
amigo o que e droga? vamos la! comercio de drogas e o que? qual quantidade deve ser considerado comercio e qual…
न जाओगे? हमने जो सुना था, सो कह दिया.’ ‘अच्छा किया—अच्छा किया. कलेजा ठंडा हो गया, आंखें ठंडी हो गईं. लड़का भी ठंडा हो गया होगा! तुम जाओ. आज चैन की नींद सोऊंगा. (बुढ़िया से) ज़रा तम्बाकू ले ले! एक चिलम और पीऊंगा. अब मालूम होगा लाला को! सारी साहबी निकल जाएगी, हमारा क्या बिगड़ा. लड़के के मर जाने से कुछ राज तो नहीं चला गया? जहां छ: बच्चे गए थे, वहां एक और चला गया, तुम्हारा तो राज सुना हो जाएगा. उसी के वास्ते सबका गला दबा-दबा कर जोड़ा था न. अब क्या करोगे? एक बार देखने जाऊंगा; पर कुछ दिन बाद मिजाज का हाल पूछूंगा.’ आदमी चला गया. भगत ने किवाड़ बन्द कर लिए, तब चिलम पर तम्बाखू रख कर पीने लगा. बुढ़िया ने कहा—इतनी रात गए जाड़े-पाले में कौन जाएगा? ‘अरे, दोपहर ही होता तो मैं न जाता. सवारी दरवाज़े पर लेने आती, तो भी न जाता. भूल नहीं गया हूं. पन्ना की सूरत आंखों में फिर रही है. इस निर्दयी ने उसे एक नज़र देखा तक नहीं. क्या मैं न जानता था कि वह न बचेगा? ख़ूब जानता था. चड्ढा भगवान नहीं थे, कि उनके एक निगाह देख लेने से अमृत बरस जाता. नहीं, ख़ाली मन की दौड़ थी. अब किसी दिन जाऊंगा और कहूंगा—क्यों साहब, कहिए, क्या रंग है? दुनिया बुरा कहेगी, कहे; कोई परवाह नहीं. छोटे आदमियों में तो सब ऐब हैं. बड़ो में कोई ऐब नहीं होता, देवता होते हैं.’ भगत के लिए यह जीवन में पहला अवसर था कि ऐसा समाचार पा कर वह बैठा रह गया हो. अस्सी वर्ष के जीवन में ऐसा कभी न हुआ था कि सांप की ख़बर पाकर वह दौड़ न गया हो. माघ-पूस की अंधेरी रात, चैत-बैसाख की धूप और लू, सावन-भादों की चढ़ी हुई नदी और नाले, किसी की उसने कभी परवाह न की. वह तुरन्त घर से निकल पड़ता था—नि:स्वार्थ, निष्काम! लेन-देन का विचार कभी दिल में आया नहीं. यह सा काम ही न था. जान का मूल्य कौन दे सकता है? यह एक पुण्य-कार्य था. सैकड़ों निराशों को उसके मंत्रों ने जीवन-दान दे दिया था; पर आप वह घर से क़दम नहीं निकाल सका. यह ख़बर सुन कर सोने जा रहा है. बुढ़िया ने कहा—तमाखू अंगीठी के पास रखी हुई है. उसके भी आज ढाई पैसे हो गए. देती ही न थी. बुढ़िया यह कह कर लेटी. बूढ़े ने कुप्पी बुझाई, कुछ देर खड़ा रहा, फिर बैठ गया. अन्त को लेट गया; पर यह ख़बर उसके हृदय पर बोझे की भांति रखी हुई थी. उसे मालूम हो रहा था, उसकी कोई चीज़ खो गई है, जैसे सारे कपड़े गीले हो गए है या पैरों में कीचड़ लगा हुआ है, जैसे कोई उसके मन में बैठा हुआ उसे घर से लिकालने के लिए कुरेद रहा है. बुढ़िया ज़रा देर में खर्राटे लेनी लगी. बूढ़े बातें करते-करते सोते है और ज़रा-सा खटा होते ही जागते हैं. तब भगत उठा, अपनी लकड़ी उठा ली, और धीरे से किवाड़ खोले. बुढ़िया ने पूछा—कहां जाते हो? ‘कहीं नहीं, देखता था कि कितनी रात है.’ ‘अभी बहुत रात है, सो जाओ.’ ‘नींद, नहीं आती.’ ‘नींद काहे आवेगी? मन तो चड्ढा के घर पर लगा हुआ है.’ ‘चड्ढा ने मेरे साथ कौन-सी नेकी कर दी है, जो वहां जाऊं? वह आ कर पैरों पड़े, तो भी न जाऊं.’ ‘उठे तो तुम इसी इरादे से ही?’ ‘नहीं री, ऐसा पागल नहीं हूं कि जो मुझे कांटे बोये, उसके लिए फूल बोता फिरूं.’ बुढ़िया फिर सो गई. भगत ने किवाड़ मेरे साथ कौन-सी नेकी कर दी है, जो वहां जाऊं? वह आ कर पैरों पड़े, तो भी न जाऊं.’ ‘उठे तो तुम इसी इरादे से ही?’ ‘नहीं री, ऐसा पागल नहीं हूं कि जो मुझे कांटे बोये, उसके लिए फूल बोता फिरूं.’ बुढ़िया फिर सो गई. भगत ने किवाड़ लगा दिए और फिर आकर बैठा. पर उसके मन की कुछ ऐसी दशा थी, जो बाजे की आवाज़ कान में पड़ते ही उपदेश सुनने वालों की होती हैं. आंखें चाहे उपेदेशक की ओर हों; पर कान बाजे ही की ओर होते हैं. दिल में भी बापे की ध्वनि गूंजती रहती है. शर्म के मारे जगह से नहीं उठता. निर्दयी प्रतिघात का भाव भगत के लिए उपदेशक था, पर हृदय उस अभागे युवक की ओर था, जो इस समय मर रहा था, जिसके लिए एक-एक पल का विलम्ब घातक था. न जाओगे? हमने जो सुना था, सो कह दिया.’ ‘अच्छा किया—अच्छा किया. कलेजा ठंडा हो गया, आंखें ठंडी हो गईं. लड़का भी ठंडा हो गया होगा! तुम जाओ. आज चैन की नींद सोऊंगा. (बुढ़िया से) ज़रा तम्बाकू ले ले! एक चिलम और पीऊंगा. अब मालूम होगा लाला को! सारी साहबी निकल जाएगी, हमारा क्या बिगड़ा. लड़के के मर जाने से कुछ राज तो नहीं चला गया? जहां छ: बच्चे गए थे, वहां एक और चला गया, तुम्हारा तो राज सुना हो जाएगा. उसी के वास्ते सबका गला दबा-दबा कर जोड़ा था न. अब क्या करोगे? एक बार देखने जाऊंगा; पर कुछ दिन बाद मिजाज का हाल पूछूंगा.’ आदमी चला गया. भगत ने किवाड़ बन्द कर लिए, तब चिलम पर तम्बाखू रख कर पीने लगा. बुढ़िया ने कहा—इतनी रात गए जाड़े-पाले में कौन जाएगा? ‘अरे, दोपहर ही होता तो मैं न जाता. सवारी दरवाज़े पर लेने आती, तो भी न जाता. भूल नहीं गया हूं. पन्ना की सूरत आंखों में फिर रही है. इस निर्दयी ने उसे एक नज़र देखा तक नहीं. क्या मैं न जानता था कि वह न बचेगा? ख़ूब जानता था. चड्ढा भगवान नहीं थे, कि उनके एक निगाह देख लेने से अमृत बरस जाता. नहीं, ख़ाली मन की दौड़ थी. अब किसी दिन जाऊंगा और कहूंगा—क्यों साहब, कहिए, क्या रंग है? दुनिया बुरा कहेगी, कहे; कोई परवाह नहीं. छोटे आदमियों में तो सब ऐब हैं. बड़ो में कोई ऐब नहीं होता, देवता होते हैं.’ भगत के लिए यह जीवन में पहला अवसर था कि ऐसा समाचार पा कर वह बैठा रह गया हो. अस्सी वर्ष के जीवन में ऐसा कभी न हुआ था कि सांप की ख़बर पाकर वह दौड़ न गया हो. माघ-पूस की अंधेरी रात, चैत-बैसाख की धूप और लू, सावन-भादों की चढ़ी हुई नदी और नाले, किसी की उसने कभी परवाह न की. वह तुरन्त घर से निकल पड़ता था—नि:स्वार्थ, निष्काम! लेन-देन का विचार कभी दिल में आया नहीं. यह सा काम ही न था. जान का मूल्य कौन दे सकता है? यह एक पुण्य-कार्य था. सैकड़ों निराशों को उसके मंत्रों ने जीवन-दान दे दिया था; पर आप वह घर से क़दम नहीं निकाल सका. यह ख़बर सुन कर सोने जा रहा है. बुढ़िया ने कहा—तमाखू अंगीठी के पास रखी हुई है. उसके भी आज ढाई पैसे हो गए. देती ही न थी. बुढ़िया यह कह कर लेटी. बूढ़े ने कुप्पी बुझाई, कुछ देर खड़ा रहा, फिर बैठ गया. अन्त को लेट गया; पर यह ख़बर उसके हृदय पर बोझे की भांति रखी हुई थी. उसे मालूम हो रहा था, उसकी कोई चीज़ खो गई है, जैसे सारे कपड़े गीले हो गए है या पैरों में कीचड़ लगा हुआ है, जैसे कोई उसके मन में बैठा हुआ उसे घर से लिकालने के लिए कुरेद रहा है. बुढ़िया ज़रा देर में खर्राटे लेनी लगी. बूढ़े बातें करते-करते सोते है और ज़रा-सा खटा होते ही जागते हैं. तब भगत उठा, अपनी लकड़ी उठा ली, और धीरे से किवाड़ खोले. बुढ़िया ने पूछा—कहां जाते हो? ‘कहीं नहीं, देखता था कि कितनी रात है.’ ‘अभी बहुत रात है, सो जाओ.’ ‘नींद, नहीं आती.’ ‘नींद काहे आवेगी? मन तो चड्ढा के घर पर लगा हुआ है.’ ‘चड्ढा ने मेरे साथ कौन-सी नेकी कर दी है, जो वहां जाऊं? वह आ कर पैरों पड़े, तो भी न जाऊं.’ ‘उठे तो तुम इसी इरादे से ही?’ ‘नहीं री, ऐसा पागल नहीं हूं कि जो मुझे कांटे बोये, उसके लिए फूल बोता फिरूं.’ बुढ़िया फिर सो गई. भगत ने किवाड़ मेरे साथ कौन-सी नेकी कर दी है, जो वहां जाऊं? वह आ कर पैरों पड़े, तो भी न जाऊं.’ ‘उठे तो तुम इसी इरादे से ही?’ ‘नहीं री, ऐसा पागल नहीं हूं कि जो मुझे कांटे बोये, उसके लिए फूल बोता फिरूं.’ बुढ़िया फिर सो गई. भगत ने किवाड़ लगा दिए और फिर आकर बैठा. पर उसके मन की कुछ ऐसी दशा थी, जो बाजे की आवाज़ कान में पड़ते ही उपदेश सुनने वालों की होती हैं. आंखें चाहे उपेदेशक की ओर हों; पर कान बाजे ही की ओर होते हैं. दिल में भी बापे की ध्वनि गूंजती रहती है. शर्म के मारे जगह से नहीं उठता. निर्दयी प्रतिघात का भाव भगत के लिए उपदेशक था, पर हृदय उस अभागे युवक की ओर था, जो इस समय मर रहा था, जिसके लिए एक-एक पल का विलम्ब घातक था. न जाओगे? हमने जो सुना था, सो कह दिया.’ ‘अच्छा किया—अच्छा किया. कलेजा ठंडा हो गया, आंखें ठंडी हो गईं. लड़का भी ठंडा हो गया होगा! तुम जाओ. आज चैन की नींद सोऊंगा. (बुढ़िया से) ज़रा तम्बाकू ले ले! एक चिलम और पीऊंगा. अब मालूम होगा लाला को! सारी साहबी निकल जाएगी, हमारा क्या बिगड़ा. लड़के के मर जाने से कुछ राज तो नहीं चला गया? जहां छ: बच्चे गए थे, वहां एक और चला गया, तुम्हारा तो राज सुना हो जाएगा. उसी के वास्ते सबका गला दबा-दबा कर जोड़ा था न. अब क्या करोगे? एक बार देखने जाऊंगा; पर कुछ दिन बाद मिजाज का हाल पूछूंगा.’ आदमी चला गया. भगत ने किवाड़ बन्द कर लिए, तब चिलम पर तम्बाखू रख कर पीने लगा. बुढ़िया ने कहा—इतनी रात गए जाड़े-पाले में कौन जाएगा? ‘अरे, दोपहर ही होता तो मैं न जाता. सवारी दरवाज़े पर लेने आती, तो भी न जाता. भूल नहीं गया हूं. पन्ना की सूरत आंखों में फिर रही है. इस निर्दयी ने उसे एक नज़र देखा तक नहीं. क्या मैं न जानता था कि वह न बचेगा? ख़ूब जानता था. चड्ढा भगवान नहीं थे, कि उनके एक निगाह देख लेने से अमृत बरस जाता. नहीं, ख़ाली मन की दौड़ थी. अब किसी दिन जाऊंगा और कहूंगा—क्यों साहब, कहिए, क्या रंग है? दुनिया बुरा कहेगी, कहे; कोई परवाह नहीं. छोटे आदमियों में तो सब ऐब हैं. बड़ो में कोई ऐब नहीं होता, देवता होते हैं.’ भगत के लिए यह जीवन में पहला अवसर था कि ऐसा समाचार पा कर वह बैठा रह गया हो. अस्सी वर्ष के जीवन में ऐसा कभी न हुआ था कि सांप की ख़बर पाकर वह दौड़ न गया हो. माघ-पूस की अंधेरी रात, चैत-बैसाख की धूप और लू, सावन-भादों की चढ़ी हुई नदी और नाले, किसी की उसने कभी परवाह न की. वह तुरन्त घर से निकल पड़ता था—नि:स्वार्थ, निष्काम! लेन-देन का विचार कभी दिल में आया नहीं. यह सा काम ही न था. जान का मूल्य कौन दे सकता है? यह एक पुण्य-कार्य था. सैकड़ों निराशों को उसके मंत्रों ने जीवन-दान दे दिया था; पर आप वह घर से क़दम नहीं निकाल सका. यह ख़बर सुन कर सोने जा रहा है. बुढ़िया ने कहा—तमाखू अंगीठी के पास रखी हुई है. उसके भी आज ढाई पैसे हो गए. देती ही न थी. बुढ़िया यह कह कर लेटी. बूढ़े ने कुप्पी बुझाई, कुछ देर खड़ा रहा, फिर बैठ गया. अन्त को लेट गया; पर यह ख़बर उसके हृदय पर बोझे की भांति रखी हुई थी. उसे मालूम हो रहा था, उसकी कोई चीज़ खो गई है, जैसे सारे कपड़े गीले हो गए है या पैरों में कीचड़ लगा हुआ है, जैसे कोई उसके मन में बैठा हुआ उसे घर से लिकालने के लिए कुरेद रहा है. बुढ़िया ज़रा देर में खर्राटे लेनी लगी. बूढ़े बातें करते-करते सोते है और ज़रा-सा खटा होते ही जागते हैं. तब भगत उठा, अपनी लकड़ी उठा ली, और धीरे से किवाड़ खोले. बुढ़िया ने पूछा—कहां जाते हो? ‘कहीं नहीं, देखता था कि कितनी रात है.’ ‘अभी बहुत रात है, सो जाओ.’ ‘नींद, नहीं आती.’ ‘नींद काहे आवेगी? मन तो चड्ढा के घर पर लगा हुआ है.’ ‘चड्ढा ने मेरे साथ कौन-सी नेकी कर दी है, जो वहां जाऊं? वह आ कर पैरों पड़े, तो भी न जाऊं.’ ‘उठे तो तुम इसी इरादे से ही?’ ‘नहीं री, ऐसा पागल नहीं हूं कि जो मुझे कांटे बोये, उसके लिए फूल बोता फिरूं.’ बुढ़िया फिर सो गई. भगत ने किवाड़ मेरे साथ कौन-सी नेकी कर दी है, जो वहां जाऊं? वह आ कर पैरों पड़े, तो भी न जाऊं.’ ‘उठे तो तुम इसी इरादे से ही?’ ‘नहीं री, ऐसा पागल नहीं हूं कि जो मुझे कांटे बोये, उसके लिए फूल बोता फिरूं.’ बुढ़िया फिर सो गई. भगत ने किवाड़ लगा दिए और फिर आकर बैठा. पर उसके मन की कुछ ऐसी दशा थी, जो बाजे की आवाज़ कान में पड़ते ही उपदेश सुनने वालों की होती हैं. आंखें चाहे उपेदेशक की ओर हों; पर कान बाजे ही की ओर होते हैं. दिल में भी बापे की ध्वनि गूंजती रहती है. शर्म के मारे जगह से नहीं उठता. निर्दयी प्रतिघात का भाव भगत के लिए उपदेशक था, पर हृदय उस अभागे युवक की ओर था, जो इस समय मर रहा था, जिसके लिए एक-एक पल का विलम्ब घातक था.
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पड़े थे, पर उन्हें तनिक भी दया न आयी थी. मैं तो उनके द्वार पर होता, तो भी बात न पूछता.’
‘तो न जाओगे? हमने जो सुना था, सो कह दिया.’ ‘अच्छा किया—अच्छा किया. कलेजा ठंडा हो गया, आंखें ठंडी हो गईं. लड़का भी ठंडा हो गया होगा! तुम जाओ. आज चैन की नींद सोऊंगा. (बुढ़िया से) ज़रा तम्बाकू ले ले! एक चिलम और पीऊंगा. अब मालूम होगा लाला को! सारी साहबी निकल जाएगी, हमारा क्या बिगड़ा. लड़के के मर जाने से कुछ राज तो नहीं चला गया? जहां छ: बच्चे गए थे, वहां एक और चला गया, तुम्हारा तो राज सुना हो जाएगा. उसी के वास्ते सबका गला दबा-दबा कर जोड़ा था न. अब क्या करोगे? एक बार देखने जाऊंगा; पर कुछ दिन बाद मिजाज का हाल पूछूंगा.’ आदमी चला गया. भगत ने किवाड़ बन्द कर लिए, तब चिलम पर तम्बाखू रख कर पीने लगा. बुढ़िया ने कहा—इतनी रात गए जाड़े-पाले में कौन जाएगा? ‘अरे, दोपहर ही होता तो मैं न जाता. सवारी दरवाज़े पर लेने आती, तो भी न जाता. भूल नहीं गया हूं. पन्ना की सूरत आंखों में फिर रही है. इस निर्दयी ने उसे एक नज़र देखा तक नहीं. क्या मैं न जानता था कि वह न बचेगा? ख़ूब जानता था. चड्ढा भगवान नहीं थे, कि उनके एक निगाह देख लेने से अमृत बरस जाता. नहीं, ख़ाली मन की दौड़ थी. अब किसी दिन जाऊंगा और कहूंगा—क्यों साहब, कहिए, क्या रंग है? दुनिया बुरा कहेगी, कहे; कोई परवाह नहीं. छोटे आदमियों में तो सब ऐब हैं. बड़ो में कोई ऐब नहीं होता, देवता होते हैं.’ भगत के लिए यह जीवन में पहला अवसर था कि ऐसा समाचार पा कर वह बैठा रह गया हो. अस्सी वर्ष के जीवन में ऐसा कभी न हुआ था कि सांप की ख़बर पाकर वह दौड़ न गया हो. माघ-पूस की अंधेरी रात, चैत-बैसाख की धूप और लू, सावन-भादों की चढ़ी हुई नदी और नाले, किसी की उसने कभी परवाह न की. वह तुरन्त घर से निकल पड़ता था—नि:स्वार्थ, निष्काम! लेन-देन का विचार कभी दिल में आया नहीं. यह सा काम ही न था. जान का मूल्य कौन दे सकता है? यह एक पुण्य-कार्य था. सैकड़ों निराशों को उसके मंत्रों ने जीवन-दान दे दिया था; पर आप वह घर से क़दम नहीं निकाल सका. यह ख़बर सुन कर सोने जा रहा है. बुढ़िया ने कहा—तमाखू अंगीठी के पास रखी हुई है. उसके भी आज ढाई पैसे हो गए. देती ही न थी. बुढ़िया यह कह कर लेटी. बूढ़े ने कुप्पी बुझाई, कुछ देर खड़ा रहा, फिर बैठ गया. अन्त को लेट गया; पर यह ख़बर उसके हृदय पर बोझे की भांति रखी हुई थी. उसे मालूम हो रहा था, उसकी कोई चीज़ खो गई है, जैसे सारे कपड़े गीले हो गए है या पैरों में कीचड़ लगा हुआ है, जैसे कोई उसके मन में बैठा हुआ उसे घर से लिकालने के लिए कुरेद रहा है. बुढ़िया ज़रा देर में खर्राटे लेनी लगी. बूढ़े बातें करते-करते सोते है और ज़रा-सा खटा होते ही जागते हैं. तब भगत उठा, अपनी लकड़ी उठा ली, और धीरे से किवाड़ खोले. बुढ़िया ने पूछा—कहां जाते हो? ‘कहीं नहीं, देखता था कि कितनी रात है.’ ‘अभी बहुत रात है, सो जाओ.’ ‘नींद, नहीं आती.’ ‘नींद काहे आवेगी? मन तो चड्ढा के घर पर लगा हुआ है.’ ‘चड्ढा ने मेरे साथ कौन-सी नेकी कर दी है, जो वहां जाऊं? वह आ कर पैरों पड़े, तो भी न जाऊं.’ ‘उठे तो तुम इसी इरादे से ही?’ ‘नहीं री, ऐसा पागल नहीं हूं कि जो मुझे कांटे बोये, उसके लिए फूल बोता फिरूं.’ बुढ़िया फिर सो गई. भगत ने किवाड़ मेरे साथ कौन-सी नेकी कर दी है, जो वहां जाऊं? वह आ कर पैरों पड़े, तो भी न जाऊं.’ ‘उठे तो तुम इसी इरादे से ही?’ ‘नहीं री, ऐसा पागल नहीं हूं कि जो मुझे कांटे बोये, उसके लिए फूल बोता फिरूं.’ बुढ़िया फिर सो गई. भगत ने किवाड़ लगा दिए और फिर आकर बैठा. पर उसके मन की कुछ ऐसी दशा थी, जो बाजे की आवाज़ कान में पड़ते ही उपदेश सुनने वालों की होती हैं. आंखें चाहे उपेदेशक की ओर हों; पर कान बाजे ही की ओर होते हैं. दिल में भी बापे की ध्वनि गूंजती रहती है. शर्म के मारे जगह से नहीं उठता. निर्दयी प्रतिघात का भाव भगत के लिए उपदेशक था, पर हृदय उस अभागे युवक की ओर था, जो इस समय मर रहा था, जिसके लिए एक-एक पल का विलम्ब घातक था. उसने फिर किवाड़ खोले, इतने धीरे से कि बुढ़िया को ख़बर भी न हुई. बाहर निकल आया. उसी वक़्त गांव का चौकीदार गश्त लगा रहा था, बोला—कैसे उठे भगत? आज तो बड़ी सरदी है! कहीं जा रहे हो क्या? भगत ने कहा—नहीं जी, जाऊंगा कहां! देखता था, अभी कितनी रात है. भला, कै बजे होंगे. चौकीदार बोला—एक बजा होगा और क्या, अभी थाने से आ रहा था, तो डॉक्टर चड्ढा बाबू के बंगले पर बड़ी भीड़ लगी हुई थी. उनके लड़के का हाल तो तुमने सुना होगा, कीड़े ने छू लिया है. चाहे मर भी गया हो. तुम चले जाओ तो साइत बच जाय. सुना है, इस हज़ार तक देने को तैयार हैं. भगत—मैं तो न जाऊं चाहे वह दस लाख भी दें. मुझे दस हज़ार या दस लाखे लेकर करना क्या हैं? कल मर जाऊंगा, फिर कौन भोगनेवाला बैठा हुआ है. चौकीदार चला गया. भगत ने आगे पैर बढ़ाया. जैसे नशे में आदमी की देह अपने क़ाबू में नहीं रहती, पैर कहीं रखता है, पड़ता कहीं है, कहता कुछ है, जबान से निकलता कुछ है, वही हाल इस समय भगत का था. मन में प्रतिकार था; पर कर्म मन के अधीन न था. जिसने कभी तलवार नहीं चलाई, वह इरादा करने पर भी तलवार नहीं चला सकता. उसके हाथ कांपते हैं, उठते ही नहीं. भगत लाठी खट-खट करता लपका चला जाता था. चेतना रोकती थी, पर उपचेतना ठेलती थी. सेवक स्वामी पर हावी था. आधी राह निकल जाने के बाद सहसा भगत रुक गया. हिंसा ने क्रिया पर विजय पायी—मैं यों ही इतनी दूर चला आया. इस जाड़े-पाले में मरने की मुझे क्या पड़ी थी? आराम से सोया क्यों नहीं? नींद न आती, न सही; दो-चार भजन ही गाता. व्यर्थ इतनी दूर दौड़ा आया. चड्ढा का लड़का रहे या मरे, मेरी कला से. मेरे साथ उन्होंने ऐसा कौन-सा सलूक किया था कि मैं उनके लिए मरूं? दुनिया में हजारों मरते हैं, हजारों जीते हैं. मुझे किसी के मरने-जीने से मतलब! मगर उपचेतन ने अब एक दूसर रूप धारण किया, जो हिंसा से बहुत कुछ मिलता-जुलता था—वह झाड़-फूंक करने नहीं जा रहा है; वह देखेगा, कि लोग क्या कर रहे हें. डॉक्टर साहब का रोना-पीटना देखेगा, किस तरह सिर पीटते हें, किस तरह पछाड़े खाते है! वे लोग तो विद्वान होते हैं, सबर कर जाते होंगे! हिंसा-भाव को यों धीरज देता हुआ वह फिर आगे बढ़ा. इतने में दो आदमी आते दिखाई दिए. दोनों बातें करते चले आ रहे थे—चड्ढा बाबू का घर उजड़ गया, वही तो एक लड़का था. भगत के कान में यह आवाज़ पड़ी. उसकी चाल और भी तेज़ हो गई. थकान के मारे पांव न उठते थे. शिरोभाग इतना बढ़ा जाता था, मानों अब मुंह के बल गिर पड़ेगा. इस तरह वह कोई दस मिनट चला होगा कि डॉक्टर साहब का बंगला नज़र आया. बिजली की बत्तियां जल रही थीं; मगर सन्नाटा छाया हुआ था. रोने-पीटने के आवाज़ भी न आती थी. भगत का कलेजा धक-धक करने लगा. कहीं मुझे बहुत देर तो नहीं हो गई? वह दौड़ने लगा. अपनी उम्र में वह इतना तेज़ कभी न दौड़ा था. बस, यही मालूम होता था, मानो उसके पीछे मौत दौड़ी आ री है.
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कैलाश ने उसकी गर्दन ख़ूब दबा कर मुंह खोल दिया और उसके ज़हरीले दांत दिखाते हुए बोला—जिन सज्जनों को शक हो, आकर देख लें. आया विश्वास या अब भी कुछ शक है? मित्रों ने आकर उसके दांत देखें और चकित हो गए. प्रत्यक्ष प्रमाण के सामने सन्देह को स्थान कहां. मित्रों का शंका-निवारण करके कैलाश ने सांप की गर्दन ढीली कर दी और उसे ज़मीन पर रखना चाहा, पर वह काला गेहूंवन क्रोध से पागल हो रहा था. गर्दन नरम पड़ते ही उसने सिर उठा कर कैलाश की उंगली में ज़ोर से काटा और वहां से भागा. कैलाश की उंगली से टप-टप ख़ून टपकने लगा. उसने ज़ोर से उंगली दबा ली और उपने कमरे की तरफ़ दौड़ा. वहां मेज की दराज में एक जड़ी रखी हुई थी, जिसे पीस कर लगा देने से घतक विष भी रफू हो जाता था. मित्रों में हलचल पड़ गई. बाहर महफिल में भी खबर हुई. डॉक्टर साहब घबरा कर दौड़े. फ़ौरन उंगली की जड़ कस कर बांधी गई और जड़ी पीसने के लिए दी गई. डॉक्टर साहब जड़ी के कायल न थे. वह उंगली का डसा भाग नश्तर से काट देना चाहते, मगर कैलाश को जड़ी पर पूर्ण विश्वास था. मृणालिनी प्यानों पर बैठी हुई थी. यह ख़बर सुनते ही दौड़ी, और कैलाश की उंगली से टपकते हुए ख़ून को रूमाल से पोंछने लगी. जड़ी पीसी जाने लगी; पर उसी एक मिनट में कैलाश की आंखें झपकने लगीं, ओठों पर पीलापन दौड़ने लगा. यहां तक कि वह खड़ा न रह सका. फ़र्श पर बैठ गया. सारे मेहमान कमरे में जमा हो गए. कोई कुछ कहता था. कोई कुछ. इतने में जड़ी पीसकर आ गई. मृणालिनी ने उंगली पर लेप किया. एक मिनट और बीता. कैलाश की आंखें बन्द हो गईं. वह लेट गया और हाथ से पंखा झलने का इशारा किया. मां ने दौड़कर उसका सिर गोद में रख लिया और बिजली का टेबुल-फैन लगा दिया. डॉक्टर साहब ने झुक कर पूछा कैलाश, कैसी तबीयत है? कैलाश ने धीरे से हाथ उठा लिए; पर कुछ बोल न सका. मृणालिनी ने करूण स्वर में कहा—क्या जड़ी कुछ असर न करेंगी? डॉक्टर साहब ने सिर पकड़ कर कहा—क्या बतलाऊं, मैं इसकी बातों में आ गया. अब तो नश्तर से भी कुछ फ़ायदा न होगा. आध घंटे तक यही हाल रहा. कैलाश की दशा प्रतिक्षण बिगड़ती जाती थी. यहां तक कि उसकी आंखें पथरा गई, हाथ-पांव ठंडे पड़ गए, मुख की कांति मलिन पड़ गई, नाड़ी का कहीं पता नहीं. मौत के सारे लक्षण दिखाई देने लगे. घर में कुहराम मच गया. मृणालिनी एक ओर सिर पीटने लगी; मां अलग पछाड़े खाने लगी. डॉक्टर चड्ढा को मित्रों ने पकड़ लिया, नहीं तो वह नश्तर अपनी गर्दन पर मार लेते. एक महाशय बोले—कोई मंत्र झाड़ने वाला मिले, तो सम्भव है, अब भी जान बच जाय. एक मुसलमान सज्जन ने इसका समर्थन किया—अरे साहब कब्र में पड़ी हुई लाशें ज़िंन्दा हो गई हैं. ऐसे-ऐसे बाकमाल पड़े हुए हैं. डॉक्टर चड्ढा बोले—मेरी अक्ल पर पत्थर पड़ गया था कि इसकी बातों में आ गया. नश्तर लगा देता, तो यह नौबत ही क्यों आती. बार-बार समझाता रहा कि बेटा, सांप न पालो, मगर कौन सुनता था! बुलाइए, किसी झाड़-फूंक करने वाले ही को बुलाइए. मेरा सब कुछ ले ले, मैं अपनी सारी जायदाद उसके पैरों पर रख दूंगा. लंगोटी बांध कर घर से निकल जाऊंगा; मगर मेरा कैलाश, मेरा प्यारा कैलाश उठ बैठे. ईश्वर के लिए किसी को बुलवाइए. एक महाशय का किसी झाड़ने वाले से परिचय था. वह दौड़कर उसे बुला लाये; मगर कैलाश की सूरत देखकर उसे मंत्र चलाने की हिम्मत न पड़ी. बोला—अब क्या हो सकता है, सरकार? जो कुछ होना था, हो चुका? अरे मूर्ख, यह क्यों नही कहता कि जो कुछ न होना था, वह कहां हुआ? मां-बाप ने बेटे का सेहरा कहां देखा? मृणालिनी का कामना-तरू क्या पल्लव और पुष्प से रंजित हो उठा? मन के वह स्वर्ण-स्वप्न जिनसे जीवन आनंद का स्रोत बना हुआ था, क्या पूरे हो गए? जीवन के नृत्यमय तारिका-मंडित सागर में आमोद की बहार लूटते हुए क्या उनकी नौका जलमग्न नहीं हो गई? जो न होना था, वह हो गया. वही हरा-भरा मैदान था, वही सुनहरी चांदनी एक नि:शब्द संगीत की भांति प्रकृति पर छायी हुई थी; वही मित्र-समाज था. वही मनोरंजन के सामान थे. मगर जहां हास्य की ध्वनि थी, वहां करुण क्रन्दन और अश्रु-प्रवाह था. पड़े थे, पर उन्हें तनिक भी दया न आयी थी. मैं तो उनके द्वार पर होता, तो भी बात न पूछता.’
‘तो न जाओगे? हमने जो सुना था, सो कह दिया.’ ‘अच्छा किया—अच्छा किया. कलेजा ठंडा हो गया, आंखें ठंडी हो गईं. लड़का भी ठंडा हो गया होगा! तुम जाओ. आज चैन की नींद सोऊंगा. (बुढ़िया से) ज़रा तम्बाकू ले ले! एक चिलम और पीऊंगा. अब मालूम होगा लाला को! सारी साहबी निकल जाएगी, हमारा क्या बिगड़ा. लड़के के मर जाने से कुछ राज तो नहीं चला गया? जहां छ: बच्चे गए थे, वहां एक और चला गया, तुम्हारा तो राज सुना हो जाएगा. उसी के वास्ते सबका गला दबा-दबा कर जोड़ा था न. अब क्या करोगे? एक बार देखने जाऊंगा; पर कुछ दिन बाद मिजाज का हाल पूछूंगा.’ आदमी चला गया. भगत ने किवाड़ बन्द कर लिए, तब चिलम पर तम्बाखू रख कर पीने लगा. बुढ़िया ने कहा—इतनी रात गए जाड़े-पाले में कौन जाएगा? ‘अरे, दोपहर ही होता तो मैं न जाता. सवारी दरवाज़े पर लेने आती, तो भी न जाता. भूल नहीं गया हूं. पन्ना की सूरत आंखों में फिर रही है. इस निर्दयी ने उसे एक नज़र देखा तक नहीं. क्या मैं न जानता था कि वह न बचेगा? ख़ूब जानता था. चड्ढा भगवान नहीं थे, कि उनके एक निगाह देख लेने से अमृत बरस जाता. नहीं, ख़ाली मन की दौड़ थी. अब किसी दिन जाऊंगा और कहूंगा—क्यों साहब, कहिए, क्या रंग है? दुनिया बुरा कहेगी, कहे; कोई परवाह नहीं. छोटे आदमियों में तो सब ऐब हैं. बड़ो में कोई ऐब नहीं होता, देवता होते हैं.’ भगत के लिए यह जीवन में पहला अवसर था कि ऐसा समाचार पा कर वह बैठा रह गया हो. अस्सी वर्ष के जीवन में ऐसा कभी न हुआ था कि सांप की ख़बर पाकर वह दौड़ न गया हो. माघ-पूस की अंधेरी रात, चैत-बैसाख की धूप और लू, सावन-भादों की चढ़ी हुई नदी और नाले, किसी की उसने कभी परवाह न की. वह तुरन्त घर से निकल पड़ता था—नि:स्वार्थ, निष्काम! लेन-देन का विचार कभी दिल में आया नहीं. यह सा काम ही न था. जान का मूल्य कौन दे सकता है? यह एक पुण्य-कार्य था. सैकड़ों निराशों को उसके मंत्रों ने जीवन-दान दे दिया था; पर आप वह घर से क़दम नहीं निकाल सका. यह ख़बर सुन कर सोने जा रहा है. बुढ़िया ने कहा—तमाखू अंगीठी के पास रखी हुई है. उसके भी आज ढाई पैसे हो गए. देती ही न थी. बुढ़िया यह कह कर लेटी. बूढ़े ने कुप्पी बुझाई, कुछ देर खड़ा रहा, फिर बैठ गया. अन्त को लेट गया; पर यह ख़बर उसके हृदय पर बोझे की भांति रखी हुई थी. उसे मालूम हो रहा था, उसकी कोई चीज़ खो गई है, जैसे सारे कपड़े गीले हो गए है या पैरों में कीचड़ लगा हुआ है, जैसे कोई उसके मन में बैठा हुआ उसे घर से लिकालने के लिए कुरेद रहा है. बुढ़िया ज़रा देर में खर्राटे लेनी लगी. बूढ़े बातें करते-करते सोते है और ज़रा-सा खटा होते ही जागते हैं. तब भगत उठा, अपनी लकड़ी उठा ली, और धीरे से किवाड़ खोले. बुढ़िया ने पूछा—कहां जाते हो? ‘कहीं नहीं, देखता था कि कितनी रात है.’ ‘अभी बहुत रात है, सो जाओ.’ ‘नींद, नहीं आती.’ ‘नींद काहे आवेगी? मन तो चड्ढा के घर पर लगा हुआ है.’ ‘चड्ढा ने मेरे साथ कौन-सी नेकी कर दी है, जो वहां जाऊं? वह आ कर पैरों पड़े, तो भी न जाऊं.’ ‘उठे तो तुम इसी इरादे से ही?’ ‘नहीं री, ऐसा पागल नहीं हूं कि जो मुझे कांटे बोये, उसके लिए फूल बोता फिरूं.’ बुढ़िया फिर सो गई. भगत ने किवाड़
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chaand sifarish jo karta hamari deta woh tumko bata sharm-o-haya pe parde gira ke karni hain hamko khata zidd hain ab toh hain khud ko mitana hona hain tujhmein fanaa chaand sifarish jo karta hamari deta woh tumko bata sharm-o-haya pe parde gira ke karni hain hamko khata
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teri adaa bhi hain jhonke wali chhu ke gujar jaane de teri lachak hain ke jaise daali dil mein utar jaane de aaja baahon mein karke bahana hona hain tujhmein fanaa chaand sifarish jo karta hamari deta woh tumko bata sharm-o-haya pe parde gira ke karni hain hamko khata
subhaan allaah subhaan allah subhaan allah subhaan allaah subhaan allah subhaan allah
hain jo iraaden bata doon tumko sharma hi jaaogi tum dhadakanen jo suna doon tumko ghabraa hi jaaogi tum hamko aata nahi hain chhupana hona hain tujhmein fanaa chaand sifarish jo karta hamari deta woh tumko bata sharm-o-haya pe parde gira ke karni hain hamko khata zidd hain ab toh hain khud ko mitana hona hain tujhmein fanaa
संध्या का समय था. डॉक्टर चड्ढा गोल्फ़ खेलने के लिए तैयार हो रहे थे. मोटर द्वार के सामने खड़ी थी कि दो कहार एक डोली लिये आते दिखाई दिए. डोली के पीछे एक बूढ़ा लाठी टेकता चला आता था. डोली औषाधालय के सामने आकर रुक गई. बूढ़े ने धीरे-धीरे आकर द्वार पर पड़ी हुई चिक से झांका. ऐसी साफ-सुथरी ज़मीन पर पैर रखते हुए भय हो रहा था कि कोई घुड़क न बैठे. डॉक्टर साहब को खड़े देख कर भी उसे कुछ कहने का साहस न हुआ. डॉक्टर साहब ने चिक के अंदर से गरज कर कहा—कौन है? क्या चाहता है? डॉक्टर साहब ने हाथ जोड़कर कहा—हुजूर बड़ा ग़रीब आदमी हूं. मेरा लड़का कई दिन से.... डॉक्टर साहब ने सिगार जला कर कहा—कल सबेरे आओ, कल सबेरे, हम इस वक़्त मरीजों को नहीं देखते. बूढ़े ने घुटने टेक कर ज़मीन पर सिर रख दिया और बोला—दुहाई है सरकार की, लड़का मर जाएगा! हुजूर, चार दिन से आंखें नहीं.... डॉक्टर चड्ढा ने कलाई पर नज़र डाली. केवल दस मिनट समय और बाकी था. गोल्फ़-स्टिक खूंटी से उतारने हुए बोले—कल सबेरे आओ, कल सबेरे; यह हमारे खेलने का समय है. बूढ़े ने पगड़ी उतार कर चौखट पर रख दी और रो कर बोला—हूजुर, एक निगाह देख लें. बस, एक निगाह! लड़का हाथ से चला जाएगा हुजूर, सात लड़कों में यही एक बच रहा है, हुजूर. हम दोनों आदमी रो-रोकर मर जाएंगे, सरकार! आपकी बढ़ती होय, दीनबंधु!
ऐसे उजड़ड देहाती यहां प्राय: रोज आया करते थे. डॉक्टर साहब उनके स्वभाव से ख़ूब परिचित थे. कोई कितना ही कुछ कहे; पर वे अपनी ही रट लगाते जाएंगे. किसी की सुनेंगे नहीं. धीरे से चिक उठाई और बाहर निकल कर मोटर की तरफ़ चले. बूढ़ा यह कहता हुआ उनके पीछे दौड़ा—सरकार, बड़ा धरम होगा. हुजूर, दया कीजिए, बड़ा दीन-दुखी हूं; संसार में कोई और नहीं है, बाबू जी! मगर डॉक्टर साहब ने उसकी ओर मुंह फेर कर देखा तक नहीं. मोटर पर बैठ कर बोले—कल सबेरे आना. मोटर चली गई. बूढ़ा कई मिनट तक मूर्ति की भांति निश्चल खड़ा रहा. संसार में ऐसे मनुष्य भी होते हैं, जो अपने आमोद-प्रमोद के आगे किसी की जान की भी परवाह नहीं करते, शायद इसका उसे अब भी विश्वास न आता था. सभ्य संसार इतना निर्मम, इतना कठोर है, इसका ऐसा मर्मभेदी अनुभव अब तक न हुआ था. वह उन पुराने जमाने की जीवों में था, जो लगी हुई आग को बुझाने, मुर्दे को कंधा देने, किसी के छप्पर को उठाने और किसी कलह को शांत करने के लिए सदैव तैयार रहते थे. जब तक बूढ़े को मोटर दिखाई दी, वह खड़ा टकटकी लगाए उस ओर ताकता रहा. शायद उसे अब भी डॉक्टर साहब के लौट आने की आशा थी. फिर उसने कहारों से डोली उठाने को कहा. डोली जिधर से आई थी, उधर ही चली गई. चारों ओर से निराश हो कर वह डॉक्टर चड्ढा के पास आया था. इनकी बड़ी तारीफ़ सुनी थी. यहां से निराश हो कर फिर वह किसी दूसरे डॉक्टर के पास न गया. क़िस्मत ठोक ली! उसी रात उसका हंसता-खेलता सात साल का बालक अपनी बाल-लीला समाप्त करके इस संसार से सिधार गया. बूढ़े मां-बाप के जीवन का यही एक आधार था. इसी का मुंह देख कर जीते थे. इस दीपक के बुझते ही जीवन की अंधेरी रात भांय-भांय करने लगी. बुढ़ापे की विशाल ममता टूटे हुए हृदय से निकल कर अंधकार आर्त्त-स्वर से रोने लगी. ,
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Yaar itna tingu message likha...ja rha h kya...mat ja दूर तलक है, सूना फ़लक अब ढूंढे तुझको कहाँ तू है किधर, ना आए नज़र आ सुन ले ये इल्तेजा मत जा रे मत जा, मत जा रे मत जा मत जा रे मत जा, मत जा रे मत जा तेरी कमी है, सांसें थमी है तन्हा है दिल मेरा दूर तलक है, सूना फ़लक अब ढूंढे तुझको कहाँ तू है किधर, ना आए नज़र आ सुन ले ये इल्तेजा मत जा रे मत जा, मत जा रे मत जा मत जा रे मत जा, मत जा रे मत जा तेरी कमी है, सांसें थमी है तन्हा है दिल मेरा.. ये कौन सा रिश्ता है मेरी आँखों से रिश्ता है ये कौन सा रिश्ता है मेरी आँखों से रिश्ता है दो दिल के पाटों में ये, बांटता है पिस्ता है दो दिल के पाटों में ये, बांटता है पिस्ता है ज़िद्द पे बस दिल को अपने तू ऐसे ना झुठला मत जा रे मत जा, मत जा रे मत जा मत जा रे मत जा, मत जा रे मत जा तेरी कमी है, सांसें थमी है तन्हा है दिल मेरा दिल इश्क़ से बिंधा है एक ज़िद्दी परिंदा है दिल इश्क़ से बिंधा है एक ज़िद्दी परिंदा है उम्मीदों से है घायल उम्मीद पे ज़िंदा है उम्मीदों से है घायल उम्मीद पे ज़िंदा है आस भरी अरदास को तू ऐसे ना ठुकरा मत जा रे मत जा, मत जा रे मत जा मत जा रे मत जा, मत जा रे मत जा तेरी कमी है, सांसें थमी है तन्हा है दिल मेरा..
संध्या का समय था. डॉक्टर चड्ढा गोल्फ़ खेलने के लिए तैयार हो रहे थे. मोटर द्वार के सामने खड़ी थी कि दो कहार एक डोली लिये आते दिखाई दिए. डोली के पीछे एक बूढ़ा लाठी टेकता चला आता था. डोली औषाधालय के सामने आकर रुक गई. बूढ़े ने धीरे-धीरे आकर द्वार पर पड़ी हुई चिक से झांका. ऐसी साफ-सुथरी ज़मीन पर पैर रखते हुए भय हो रहा था कि कोई घुड़क न बैठे. डॉक्टर साहब को खड़े देख कर भी उसे कुछ कहने का साहस न हुआ. डॉक्टर साहब ने चिक के अंदर से गरज कर कहा—कौन है? क्या चाहता है? डॉक्टर साहब ने हाथ जोड़कर कहा—हुजूर बड़ा ग़रीब आदमी हूं. मेरा लड़का कई दिन से.... डॉक्टर साहब ने सिगार जला कर कहा—कल सबेरे आओ, कल सबेरे, हम इस वक़्त मरीजों को नहीं देखते. बूढ़े ने घुटने टेक कर ज़मीन पर सिर रख दिया और बोला—दुहाई है सरकार की, लड़का मर जाएगा! हुजूर, चार दिन से आंखें नहीं.... डॉक्टर चड्ढा ने कलाई पर नज़र डाली. केवल दस मिनट समय और बाकी था. गोल्फ़-स्टिक खूंटी से उतारने हुए बोले—कल सबेरे आओ, कल सबेरे; यह हमारे खेलने का समय है. बूढ़े ने पगड़ी उतार कर चौखट पर रख दी और रो कर बोला—हूजुर, एक निगाह देख लें. बस, एक निगाह! लड़का हाथ से चला जाएगा हुजूर, सात लड़कों में यही एक बच रहा है, हुजूर. हम दोनों आदमी रो-रोकर मर जाएंगे, सरकार! आपकी बढ़ती होय, दीनबंधु!
ऐसे उजड़ड देहाती यहां प्राय: रोज आया करते थे. डॉक्टर साहब उनके स्वभाव से ख़ूब परिचित थे. कोई कितना ही कुछ कहे; पर वे अपनी ही रट लगाते जाएंगे. किसी की सुनेंगे नहीं. धीरे से चिक उठाई और बाहर निकल कर मोटर की तरफ़ चले. बूढ़ा यह कहता हुआ उनके पीछे दौड़ा—सरकार, बड़ा धरम होगा. हुजूर, दया कीजिए, बड़ा दीन-दुखी हूं; संसार में कोई और नहीं है, बाबू जी! मगर डॉक्टर साहब ने उसकी ओर मुंह फेर कर देखा तक नहीं. मोटर पर बैठ कर बोले—कल सबेरे आना. मोटर चली गई. बूढ़ा कई मिनट तक मूर्ति की भांति निश्चल खड़ा रहा. संसार में ऐसे मनुष्य भी होते हैं, जो अपने आमोद-प्रमोद के आगे किसी की जान की भी परवाह नहीं करते, शायद इसका उसे अब भी विश्वास न आता था. सभ्य संसार इतना निर्मम, इतना कठोर है, इसका ऐसा मर्मभेदी अनुभव अब तक न हुआ था. वह उन पुराने जमाने की जीवों में था, जो लगी हुई आग को बुझाने, मुर्दे को कंधा देने, किसी के छप्पर को उठाने और किसी कलह को शांत करने के लिए सदैव तैयार रहते थे. जब तक बूढ़े को मोटर दिखाई दी, वह खड़ा टकटकी लगाए उस ओर ताकता रहा. शायद उसे अब भी डॉक्टर साहब के लौट आने की आशा थी. फिर उसने कहारों से डोली उठाने को कहा. डोली जिधर से आई थी, उधर ही चली गई. चारों ओर से निराश हो कर वह डॉक्टर चड्ढा के पास आया था. इनकी बड़ी तारीफ़ सुनी थी. यहां से निराश हो कर फिर वह किसी दूसरे डॉक्टर के पास न गया. क़िस्मत ठोक ली! उसी रात उसका हंसता-खेलता सात साल का बालक अपनी बाल-लीला समाप्त करके इस संसार से सिधार गया. बूढ़े मां-बाप के जीवन का यही एक आधार था. इसी का मुंह देख कर जीते थे. इस दीपक के बुझते ही जीवन की अंधेरी रात भांय-भांय करने लगी. बुढ़ापे की विशाल ममता टूटे हुए हृदय से निकल कर अंधकार आर्त्त-स्वर से रोने लगी. , कई साल गुज़र गए. डॉक्टर चड्ढा ने ख़ूब यश और धन कमाया; लेकिन इसके साथ ही अपने स्वास्थ्य की रक्षा भी की, जो एक साधारण बात थी. यह उनके नियमित जीवन का आर्शीवाद था कि पचास वर्ष की अवस्था में उनकी चुस्ती और फुर्ती युवकों को भी लज्जित करती थी. उनके हर एक काम का समय नियत था, इस नियम से वह जौ-भर भी न टलते थे. बहुधा लोग स्वास्थ्य के नियमों का पालन उस समय करते हैं, जब रोगी हो जाते हैं. डॉक्टर चड्ढा उपचार और संयम का रहस्य ख़ूब समझते थे. उनकी संतान-संध्या भी इसी नियम के अधीन थी. उनके केवल दो बच्चे हुए, एक लड़का और एक लड़की. तीसरी संतान न हुई, इसीलिए श्रीमती चड्ढा भी अभी जवान मालूम होती थीं. लड़की का तो विवाह हो चुका था. लड़का कॉलेज में पढ़ता था. वही माता-पिता के जीवन का आधार था. शील और विनय का पुतला, बड़ा ही रसिक, बड़ा ही उदार, विद्यालय का गौरव, युवक-समाज की शोभा. मुखमंडल से तेज की छटा-सी निकलती थी. आज उसकी बीसवीं सालगिरह थी. संध्या का समय था. हरी-हरी घास पर कुर्सियां बिछी हुई थी. शहर के रईस और हुक्काम एक तरफ़, कॉलेज के छात्र दूसरी तरफ़ बैठे भोजन कर रहे थे. बिजली के प्रकाश से सारा मैंदान जगमगा रहा था. आमोद-प्रमोद का सामान भी जमा था. छोटा-सा प्रहसन खेलने की तैयारी थी. प्रहसन स्वयं कैलाशनाथ ने लिखा था. वही मुख्य ऐक्टर भी था. इस समय वह एक रेशमी कमीज पहने, नंगे सिर, नंगे पांव, इधर से उधर मित्रों की आव भगत में लगा हुआ था. कोई पुकारता—कैलाश, ज़रा इधर आना; कोई उधर से बुलाता—कैलाश, क्या उधर ही रहोगे? सभी उसे छोड़ते थे, चुहलें करते थे, बेचारे को ज़रा दम मारने का अवकाश न मिलता था. सहसा एक रमणी ने उसके पास आकर पूछा—क्यों कैलाश, तुम्हारे सांप कहां हैं? ज़रा मुझे दिखा दो. कैलाश ने उससे हाथ मिला कर कहा—मृणालिनी, इस वक़्त क्षमा करो, कल दिखा दूंगा. मृणालिनी ने आग्रह किया—जी नहीं, तुम्हें दिखाना पड़ेगा, मैं आज नहीं मानने की. तुम रोज़ ‘कल-कल’ करते हो. मृणालिनी और कैलाश दोनों सहपाठी थे ओर एक-दूसरे के प्रेम में पगे हुए. कैलाश को सांपों के पालने, खेलाने और नचाने का शौक़ था. तरह-तरह के सांप पाल रखे थे. उनके स्वभाव और चरित्र की परीक्षा करता रहता था. थोड़े दिन हुए, उसने विद्यालय में ‘सांपों’ पर एक मार्के का व्याख्यान दिया था. सांपों को नचा कर दिखाया भी था! प्राणिशास्त्र के बड़े-बड़े पंडित भी यह व्याख्यान सुन कर दंग रह गए थे! यह विद्या उसने एक बड़े संपेरे से सीखी थी. सांपों की जड़ी-बूटियां जमा करने का उसे मरज था. इतना पता भर मिल जाय कि किसी व्यक्ति के पास कोई अच्छी जड़ी है, फिर उसे चैन न आता था. उसे लेकर ही छोड़ता था. यही व्यसन था. इस पर हज़ारों रुपए फूंक चुका था. मृणालिनी कई बार आ चुकी थी; पर कभी सांपों को देखने के लिए इतनी उत्सुक न हुई थी. कह नहीं सकते, आज उसकी उत्सुकता सचमुच जाग गई थी, या वह कैलाश पर उपने अधिकार का प्रदर्शन करना चाहती थी; पर उसका आग्रह बेमौक़ा था. उस कोठरी में कितनी भीड़ लग जाएगी, भीड़ को देख कर सांप कितने चौकेंगें और रात के समय उन्हें छेड़ा जाना कितना बुरा लगेगा, इन बातों का उसे ज़रा भी ध्यान न आया. कैलाश ने कहा—नहीं, कल ज़रूर दिखा दूंगा. इस वक़्त अच्छी तरह दिखा भी तो न सकूंगा, कमरे में तिल रखने को भी जगह न मिलेगी. एक महाशय ने छेड़ कर कहा—दिखा क्यों नहीं देते, ज़रा-सी बात के लिए इतना टाल-मटोल कर रहे हो? मिस गोविंद, हर्गिज न मानना. देखें कैसे नहीं दिखाते! दूसरे महाशय ने और रद्दा चढ़ाया—मिस गोविंद इतनी सीधी और भोली हैं, तभी आप इतना मिजाज करते हैं; दूसरे सुंदरी होती, तो इसी बात पर बिगड़ खड़ी होती. तीसरे साहब ने मज़ाक उड़ाया—अजी बोलना छोड़ देती. भला, कोई बात है! इस पर आपका दावा है कि मृणालिनी के लिए जान हाजिर है. मृणालिनी ने देखा कि ये शोहदे उसे रंग पर चढ़ा रहे हैं, तो बोली—आप लोग मेरी वकालत न करें, मैं खुद अपनी वकालत कर लूंगी. मैं इस वक़्त सांपों का तमाशा नहीं देखना चाहती. चलो, छुट्टी हुई. इस पर मित्रों ने ठट्टा लगाया. एक साहब बोले—देखना तो आप सब कुछ चाहें, पर दिखाए भी तो? कैलाश को मृणालिनी की झेंपी हुई सूरत को देखकर मालूम हुआ कि इस वक़्त उनका इनकार वास्तव में उसे बुरा लगा है. ज्यों ही प्रीति-भोज समाप्त हुआ और गाना शुरू हुआ, उसने मृणालिनी और अन्य मित्रों को सांपों के दरबे के सामने ले जाकर महुअर बजाना शुरू किया. फिर एक-एक खाना खोलकर एक-एक सांप को निकालने लगा. वाह! क्या कमाल था! ऐसा जान पड़ता था कि वे कीड़े उसकी एक-एक बात, उसके मन का एक-एक भाव समझते हैं. किसी को उठा लिया, किसी को गरदन में डाल लिया, किसी को हाथ में लपेट लिया. मृणालिनी बार-बार मना करती कि इन्हें गर्दन में न डालों, दूर ही से दिखा दो. बस, ज़रा नचा दो. कैलाश की गरदन में सांपों को लिपटते देख कर उसकी जान निकली जाती थी. पछता रही थी कि मैंने व्यर्थ ही इनसे सांप दिखाने को कहा; मगर कैलाश एक न सुनता था. प्रेमिका के सम्मुख अपने सर्प-कला-प्रदर्शन का ऐसा अवसर पाकर वह कब चूकता! एक मित्र ने टीका की—दांत तोड़ डाले होंगे. कैलाश हंसकर बोला—दांत तोड़ डालना मदारियों का काम है. किसी के दांत नहीं तोड़ गए. कहिए तो दिखा दूं? कह कर उसने एक काले सांप को पकड़ लिया और बोला—’मेरे पास इससे बड़ा और ज़हरीला सांप दूसरा नहीं है, अगर किसी को काट ले, तो आदमी आनन-फानन में मर जाए. लहर भी न आए. इसके काटे पर मन्त्र नहीं. इसके दांत दिखा दूं?’ मृणालिनी ने उसका हाथ पकड़कर कहा—नहीं-नहीं, कैलाश, ईश्वर के लिए इसे छोड़ दो. तुम्हारे पैरों पड़ती हूं. इस पर एक-दूसरे मित्र बोले—मुझे तो विश्वास नहीं आता, लेकिन तुम कहते हो, तो मान लूंगा. कैलाश ने सांप की गरदन पकड़कर कहा—नहीं साहब, आप आंखों से देख कर मानिए. दांत तोड़कर वश में किया, तो क्या. सांप बड़ा समझदार होता हैं! अगर उसे विश्वास हो जाए कि इस आदमी से मुझे कोई हानि न पहुंचेगी, तो वह उसे हर्गिज न काटेगा. मृणालिनी ने जब देखा कि कैलाश पर इस वक़्त भूत सवार है, तो उसने यह तमाशा न करने के विचार से कहा—अच्छा भाई, अब यहां से चलो. देखा, गाना शुरू हो गया है. आज मैं भी कोई चीज सुनाऊंगी. यह कहते हुए उसने कैलाश का कंधा पकड़ कर चलने का इशारा किया और कमरे से निकल गई; मगर कैलाश विरोधियों का शंका-समाधान करके ही दम लेना चाहता था. उसने सांप की गरदन पकड़ कर ज़ोर से दबाई, इतनी ज़ोर से दबाई कि उसका मुंह लाल हो गया, देह की सारी नसें तन गईं. सांप ने अब तक उसके हाथों ऐसा व्यवहार न देखा था. उसकी समझ में न आता था कि यह मुझसे क्या चाहते हैं. उसे शायद भ्रम हुआ कि मुझे मार डालना चाहते हैं, अतएव वह आत्मरक्षा के लिए तैयार हो गया. कैलाश ने उसकी गर्दन ख़ूब दबा कर मुंह खोल दिया और उसके ज़हरीले दांत दिखाते हुए बोला—जिन सज्जनों को शक हो, आकर देख लें. आया विश्वास या अब भी कुछ शक है? मित्रों ने आकर उसके दांत देखें और चकित हो गए. प्रत्यक्ष प्रमाण के सामने सन्देह को स्थान कहां. मित्रों का शंका-निवारण करके कैलाश ने सांप की गर्दन ढीली कर दी और उसे ज़मीन पर रखना चाहा, पर वह काला गेहूंवन क्रोध से पागल हो रहा था. गर्दन नरम पड़ते ही उसने सिर उठा कर कैलाश की उंगली में ज़ोर से काटा और वहां से भागा. कैलाश की उंगली से टप-टप ख़ून टपकने लगा. उसने ज़ोर से उंगली दबा ली और उपने कमरे की तरफ़ दौड़ा. वहां मेज की दराज में एक जड़ी रखी हुई थी, जिसे पीस कर लगा देने से घतक विष भी रफू हो जाता था. मित्रों में हलचल पड़ गई. बाहर महफिल में भी खबर हुई. डॉक्टर साहब घबरा कर दौड़े. फ़ौरन उंगली की जड़ कस कर बांधी गई और जड़ी पीसने के लिए दी गई. डॉक्टर साहब जड़ी के कायल न थे. वह उंगली का डसा भाग नश्तर से काट देना चाहते, मगर कैलाश को जड़ी पर पूर्ण विश्वास था. मृणालिनी प्यानों पर बैठी हुई थी. यह ख़बर सुनते ही दौड़ी, और कैलाश की उंगली से
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श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि बरनऊं रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन कुमार बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार जय हनुमान ज्ञान गुन सागर जय कपीस तिहुं लोक उजागर रामदूत अतुलित बल धामा अंजनि पुत्र पवनसुत नामा महाबीर बिक्रम बजरंगी कुमति निवार सुमति के संगी कंचन बरन बिराज सुबेसा कानन कुंडल कुंचित केसा हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै कांधे मूंज जनेऊ साजै संकर सुवन केसरीनंदन तेज प्रताप महा जग बन्दन विद्यावान गुनी अति चातुर राम काज करिबे को आतुर प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया राम लखन सीता मन बसिया सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा बिकट रूप धरि लंक जरावा भीम रूप धरि असुर संहारे रामचंद्र के काज संवारे लाय सजीवन लखन जियाये श्रीरघुबीर हरषि उर लाये रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई सहस बदन तुम्हरो जस गावैं अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा नारद सारद सहित अहीसा जम कुबेर दिगपाल जहां ते कबि कोबिद कहि सके कहां ते तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा राम मिलाय राज पद दीन्हा तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना लंकेस्वर भए सब जग जाना जुग सहस्र जोजन पर भानू लील्यो ताहि मधुर फल जानू प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं जलधि लांघि गये अचरज नाहीं दुर्गम काज जगत के जेते सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते राम दुआरे तुम रखवारे होत न आज्ञा बिनु पैसारे सब सुख लहै तुम्हारी सरना तुम रक्षक काहू को डर ना आपन तेज सम्हारो आपै तीनों लोक हांक तें कांपै भूत पिसाच निकट नहिं आवै महाबीर जब नाम सुनावै नासै रोग हरै सब पीरा जपत निरंतर हनुमत बीरा संकट तें हनुमान छुड़ावै मन क्रम बचन ध्यान जो लावै सब पर राम तपस्वी राजा तिन के काज सकल तुम साजा और मनोरथ जो कोई लावै सोइ अमित जीवन फल पावै चारों जुग परताप तुम्हारा है परसिद्ध जगत उजियारा साधु संत के तुम रखवारे असुर निकंदन राम दुलारे अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता अस बर दीन जानकी माता राम रसायन तुम्हरे पासा सदा रहो रघुपति के दासा तुम्हरे भजन राम को पावै जनम-जनम के दुख बिसरावै अन्तकाल रघुबर पुर जाई जहां जन्म हरि भक्त कहाई और देवता चित्त न धरई हनुमत सेइ सर्ब सुख करई संकट कटै मिटै सब पीरा जो सुमिरै हनुमत बलबीरा जै जै जै हनुमान गोसाईं कृपा करहु गुरुदेव की नाईं जो सत बार पाठ कर कोई छूटहि बंदि महा सुख होई जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा होय सिद्धि साखी गौरीसा तुलसीदास सदा हरि चेरा कीजै नाथ हृदय मंह डेरा कीजै नाथ हृदय मंह डेरा पवन तनय संकट हरन मंगल मूरति रूप राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप
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इस स्तोत्र को, जो भी पढ़ता है, याद करता है और सुनाता है, वह सदैव के लिए पवित्र हो जाता है और महान गुरु शिव की भक्ति पाता है। इस भक्ति के लिए कोई दूसरा मार्ग या उपाय नहीं है। बस शिव का विचार ही भ्रम को दूर कर देता है।
सद्गुरु: रावण शिव का महान भक्त था, और उनके बारे में अनेक कहानियां प्रचलित हैं। एक भक्त को महान नहीं होना चाहिये लेकिन वह एक महान भक्त था। वह दक्षिण से इतनी लंबी दूरी तय कर के कैलाश आया- मैं चाहता हूँ कि आप बस कल्पना करें, इतनी लंबी दूरी चल के आना – और वो शिव की प्रशंसा में स्तुति गाने लगा। उसके पास एक ड्रम था, जिसकी ताल पर उसने तुरंत ही 1008 छंदों की रचना कर डाली, जिसे शिव तांडव स्तोत्र के नाम से जाना जाता है।
उसके संगीत को सुन कर शिव बहुत ही आनंदित व मोहित हो गये। रावण गाता जा रहा था, और गाने के साथ–साथ उसने दक्षिण की ओर से कैलाश पर चढ़ना शुरू कर दिया। जब रावण लगभग ऊपर तक आ गया, और शिव उसके संगीत में मंत्रमुग्ध थे, तो पार्वती ने देखा कि एक व्यक्ति ऊपर आ रहा था।
अब ऊपर, शिखर पर केवल दो लोगों के लिये ही जगह है। तो पार्वती ने शिव को उनके हर्षोन्माद से बाहर लाने की कोशिश की। वे बोलीं, "वो व्यक्ति बिल्कुल ऊपर ही आ गया है"।
अब ऊपर, शिखर पर केवल दो लोगों के लिये ही जगह है। तो पार्वती ने शिव को उनके हर्षोन्माद से बाहर लाने की कोशिश की। वे बोलीं, “वो व्यक्ति बिल्कुल ऊपर ही आ गया है”। लेकिन शिव अभी भी संगीत और काव्य की मस्ती में लीन थे। आखिरकार पार्वती उनको
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Bas boht badhiya Ye mere bachpan k time ka actually main apni baaji k saath gaati thi
tadap yeh ishk ki dil se kabhi nahi jati ki jan de dekar bhi divangi nahi jati najane woh kaunsi dunia hai woh mere rabba jaha se lautke koyi sada nahi aati
ishk me toh har chij mit jati hai bekrari bankar hame tadpati hai yad yad yad, bus yad reh jati hai yad yad yad, bus yad reh jati hai ishk me toh har chij mit jati hai ishk me toh har chij mit jati hai bekrari bankar hame tadpati ha bekrari bankar hame tadpati ha yad yad yad, bus yad reh jati hai yad yad yad, bus yad reh jati hai woh teri yad woh teri yad yad yad yad yad, bus yad reh jati hai yad yad yad, bus yad reh jati hai
karke tanha yeh jindagani kyu gayi chhod ke kahani abb yeh aansu piya naa jaye bin tere abb jiya naa jaye dard se tutti meri sanse jakhm dil ka siya na jaye dard se tutti meri sanse jakhm dil ka siya na jaye aaja aaja meri wafa tujhe bulati hai aaja aaja meri wafa tujhe bulati hai yad yad yad, bus yad reh jati hai yad yad yad bus yad reh jati hai woh teri yad woh teri yad yad yad yad yad, bus yad reh jati hai yad yad yad bus yad reh jati hai
yad me dekho bana hai yeh hasin tajmahal yad me koi likhe shamo sehar shokh ghajal yad me dekho bana hai yeh hasin tajmahal yad me koi likhe shamo sehar shokh ghajal dil ke dariya me khilta hai khwabo ka kamal yad aate hai hamesha woh gujre huye pal tu nahi hai teri yade mujhe satati hai tu nahi hai teri yade mujhe satati hai yad yad yad, bus yad reh jati hai yad yad yad, bus yad reh jati hai
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Theek h phir ab krte hi h dhang se...start lets go...tere ko hindi gaane sunati hu...chl aa....shaadi k gaane se shuru krenge शहनाइयों की सदा कह रही है ख़ुशी की मुबारक घड़ी आ गई है सजी सुर्ख़ जोड़े में चाँद से दुल्हन ज़मीं पे फलक से परी आ गयी है दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है पल भर में कैसे बदलते हैं रिश्ते पल भर में कैसे बदलते हैं रिश्ते अब तो हर अपना बेग़ाना लगता है दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है सात फेरों से बंधा जन्मों का ये बंधन प्यार से जोड़ा है रब ने प्रीत का दामन सात फेरों से बंधा जन्मों का ये बंधन प्यार से जोड़ा है रब ने प्रीत का दामन हैं नई रस्में, नई कसमें, नई उलझन होंठ हैं खामोश लेकिन कह रही धड़कन धड़कन-धड़कन, धड़कन-धड़कन धड़कन-धड़कन, धड़कन-धड़कन धड़कन, मेरी धड़कन, धड़कन, तेरी धड़कन धड़कन, मेरी धड़कन, धड़कन, तेरी धड़कन धड़कन, धड़कन, धड़कन, धड़कन धड़कन, धड़कन, धड़कन, धड़कन, धड़कन मेरी धड़कन, मेरी धड़कन मुश्किल अश्कों को छुपाना लगता है मुश्किल अश्कों को छुपाना लगता है दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है पल भर में कैसे बदलते हैं रिश्ते अब तो हर अपना बेग़ाना लगता है दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है मैं तेरी बाहों के झूले में पली बाबुल जा रही हूँ छोड़ के तेरी गली बाबुल मैं तेरी बाहों के झूले में पली बाबुल मैं तेरी बाहों के झूले में पली बाबुल मैं तेरी बाहों के झूले में पली बाबुल जा रही हूँ छोड़ के तेरी गली बाबुल खूबसूरत ये ज़माने याद आएँगे चाह के भी हम तुम्हे ना भूल पाएँगे मुश्किल मुश्किल-मुश्किल दामन को छुड़ाना लगता है दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है मुश्किल दामन को छुड़ाना लगता है दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है पल भर में कैसे बदलते हैं रिश्ते अब तो हर अपना बेग़ाना लगता है दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है धड़कन-धड़कन, धड़कन-धड़कन धड़कन-धड़कन, धड़कन, धड़कन-धड़कन धड़कन-धड़कन, धड़कन-धड़कन धड़कन-धड़कन, धड़कन, धड़कन-धड़कन
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Kya ek se ek nalayak mila yaha.....sahi me tum logo se vibe aati h ki tum nashediyo ke liye khade hoge...koi matlab h iss cheez ka pta ni kya sochke aate h ki logo ko fark padega
Also...please mark spoilers....dont make this a dangerous place for ppl who have not watched it yet.
‘अच्छा किया—अच्छा किया. कलेजा ठंडा हो गया, आंखें ठंडी हो गईं. लड़का भी ठंडा हो गया होगा! तुम जाओ. आज चैन की नींद सोऊंगा. (बुढ़िया से) ज़रा तम्बाकू ले ले! एक चिलम और पीऊंगा. अब मालूम होगा लाला को! सारी साहबी निकल जाएगी, हमारा क्या बिगड़ा. लड़के के मर जाने से कुछ राज तो नहीं चला गया? जहां छ: बच्चे गए थे, वहां एक और चला गया, तुम्हारा तो राज सुना हो जाएगा. उसी के वास्ते सबका गला दबा-दबा कर जोड़ा था न. अब क्या करोगे? एक बार देखने जाऊंगा; पर कुछ दिन बाद मिजाज का हाल पूछूंगा.’
आदमी चला गया. भगत ने किवाड़ बन्द कर लिए, तब चिलम पर तम्बाखू रख कर पीने लगा.
बुढ़िया ने कहा—इतनी रात गए जाड़े-पाले में कौन जाएगा?
‘अरे, दोपहर ही होता तो मैं न जाता. सवारी दरवाज़े पर लेने आती, तो भी न जाता. भूल नहीं गया हूं. पन्ना की सूरत आंखों में फिर रही है. इस निर्दयी ने उसे एक नज़र देखा तक नहीं. क्या मैं न जानता था कि वह न बचेगा? ख़ूब जानता था. चड्ढा भगवान नहीं थे, कि उनके एक निगाह देख लेने से अमृत बरस जाता. नहीं, ख़ाली मन की दौड़ थी. अब किसी दिन जाऊंगा और कहूंगा—क्यों साहब, कहिए, क्या रंग है? दुनिया बुरा कहेगी, कहे; कोई परवाह नहीं. छोटे आदमियों में तो सब ऐब हैं. बड़ो में कोई ऐब नहीं होता, देवता होते हैं.’
भगत के लिए यह जीवन में पहला अवसर था कि ऐसा समाचार पा कर वह बैठा रह गया हो. अस्सी वर्ष के जीवन में ऐसा कभी न हुआ था कि सांप की ख़बर पाकर वह दौड़ न गया हो. माघ-पूस की अंधेरी रात, चैत-बैसाख की धूप और लू, सावन-भादों की चढ़ी हुई नदी और नाले, किसी की उसने कभी परवाह न की. वह तुरन्त घर से निकल पड़ता था—नि:स्वार्थ, निष्काम! लेन-देन का विचार कभी दिल में आया नहीं. यह सा काम ही न था. जान का मूल्य कौन दे सकता है? यह एक पुण्य-कार्य था. सैकड़ों निराशों को उसके मंत्रों ने जीवन-दान दे दिया था; पर आप वह घर से क़दम नहीं निकाल सका. यह ख़बर सुन कर सोने जा रहा है.
बुढ़िया ने कहा—तमाखू अंगीठी के पास रखी हुई है. उसके भी आज ढाई पैसे हो गए. देती ही न थी. बुढ़िया यह कह कर लेटी. बूढ़े ने कुप्पी बुझाई, कुछ देर खड़ा रहा, फिर बैठ गया. अन्त को लेट गया; पर यह ख़बर उसके हृदय पर बोझे की भांति रखी हुई थी. उसे मालूम हो रहा था, उसकी कोई चीज़ खो गई है, जैसे सारे कपड़े गीले हो गए है या पैरों में कीचड़ लगा हुआ है, जैसे कोई उसके मन में बैठा हुआ उसे घर से लिकालने के लिए कुरेद रहा है. बुढ़िया ज़रा देर में खर्राटे लेनी लगी. बूढ़े बातें करते-करते सोते है और ज़रा-सा खटा होते ही जागते हैं. तब भगत उठा, अपनी लकड़ी उठा ली, और धीरे से किवाड़ खोले.
बुढ़िया ने पूछा—कहां जाते हो?
‘कहीं नहीं, देखता था कि कितनी रात है.’
‘अभी बहुत रात है, सो जाओ.’
‘नींद, नहीं आती.’
‘नींद काहे आवेगी? मन तो चड्ढा के घर पर लगा हुआ है.’
‘चड्ढा ने मेरे साथ कौन-सी नेकी कर दी है, जो वहां जाऊं? वह आ कर पैरों पड़े, तो भी न जाऊं.’
‘उठे तो तुम इसी इरादे से ही?’
‘नहीं री, ऐसा पागल नहीं हूं कि जो मुझे कांटे बोये, उसके लिए फूल बोता फिरूं.’
बुढ़िया फिर सो गई. भगत ने किवाड़
मेरे साथ कौन-सी नेकी कर दी है, जो वहां जाऊं? वह आ कर पैरों पड़े, तो भी न जाऊं.’
‘उठे तो तुम इसी इरादे से ही?’
‘नहीं री, ऐसा पागल नहीं हूं कि जो मुझे कांटे बोये, उसके लिए फूल बोता फिरूं.’
बुढ़िया फिर सो गई. भगत ने किवाड़ लगा दिए और फिर आकर बैठा. पर उसके मन की कुछ ऐसी दशा थी, जो बाजे की आवाज़ कान में पड़ते ही उपदेश सुनने वालों की होती हैं. आंखें चाहे उपेदेशक की ओर हों; पर कान बाजे ही की ओर होते हैं. दिल में भी बापे की ध्वनि गूंजती रहती है. शर्म के मारे जगह से नहीं उठता. निर्दयी प्रतिघात का भाव भगत के लिए उपदेशक था, पर हृदय उस अभागे युवक की ओर था, जो इस समय मर रहा था, जिसके लिए एक-एक पल का विलम्ब घातक था.
न जाओगे? हमने जो सुना था, सो कह दिया.’
‘अच्छा किया—अच्छा किया. कलेजा ठंडा हो गया, आंखें ठंडी हो गईं. लड़का भी ठंडा हो गया होगा! तुम जाओ. आज चैन की नींद सोऊंगा. (बुढ़िया से) ज़रा तम्बाकू ले ले! एक चिलम और पीऊंगा. अब मालूम होगा लाला को! सारी साहबी निकल जाएगी, हमारा क्या बिगड़ा. लड़के के मर जाने से कुछ राज तो नहीं चला गया? जहां छ: बच्चे गए थे, वहां एक और चला गया, तुम्हारा तो राज सुना हो जाएगा. उसी के वास्ते सबका गला दबा-दबा कर जोड़ा था न. अब क्या करोगे? एक बार देखने जाऊंगा; पर कुछ दिन बाद मिजाज का हाल पूछूंगा.’
आदमी चला गया. भगत ने किवाड़ बन्द कर लिए, तब चिलम पर तम्बाखू रख कर पीने लगा.
बुढ़िया ने कहा—इतनी रात गए जाड़े-पाले में कौन जाएगा?
‘अरे, दोपहर ही होता तो मैं न जाता. सवारी दरवाज़े पर लेने आती, तो भी न जाता. भूल नहीं गया हूं. पन्ना की सूरत आंखों में फिर रही है. इस निर्दयी ने उसे एक नज़र देखा तक नहीं. क्या मैं न जानता था कि वह न बचेगा? ख़ूब जानता था. चड्ढा भगवान नहीं थे, कि उनके एक निगाह देख लेने से अमृत बरस जाता. नहीं, ख़ाली मन की दौड़ थी. अब किसी दिन जाऊंगा और कहूंगा—क्यों साहब, कहिए, क्या रंग है? दुनिया बुरा कहेगी, कहे; कोई परवाह नहीं. छोटे आदमियों में तो सब ऐब हैं. बड़ो में कोई ऐब नहीं होता, देवता होते हैं.’
भगत के लिए यह जीवन में पहला अवसर था कि ऐसा समाचार पा कर वह बैठा रह गया हो. अस्सी वर्ष के जीवन में ऐसा कभी न हुआ था कि सांप की ख़बर पाकर वह दौड़ न गया हो. माघ-पूस की अंधेरी रात, चैत-बैसाख की धूप और लू, सावन-भादों की चढ़ी हुई नदी और नाले, किसी की उसने कभी परवाह न की. वह तुरन्त घर से निकल पड़ता था—नि:स्वार्थ, निष्काम! लेन-देन का विचार कभी दिल में आया नहीं. यह सा काम ही न था. जान का मूल्य कौन दे सकता है? यह एक पुण्य-कार्य था. सैकड़ों निराशों को उसके मंत्रों ने जीवन-दान दे दिया था; पर आप वह घर से क़दम नहीं निकाल सका. यह ख़बर सुन कर सोने जा रहा है.
बुढ़िया ने कहा—तमाखू अंगीठी के पास रखी हुई है. उसके भी आज ढाई पैसे हो गए. देती ही न थी. बुढ़िया यह कह कर लेटी. बूढ़े ने कुप्पी बुझाई, कुछ देर खड़ा रहा, फिर बैठ गया. अन्त को लेट गया; पर यह ख़बर उसके हृदय पर बोझे की भांति रखी हुई थी. उसे मालूम हो रहा था, उसकी कोई चीज़ खो गई है, जैसे सारे कपड़े गीले हो गए है या पैरों में कीचड़ लगा हुआ है, जैसे कोई उसके मन में बैठा हुआ उसे घर से लिकालने के लिए कुरेद रहा है. बुढ़िया ज़रा देर में खर्राटे लेनी लगी. बूढ़े बातें करते-करते सोते है और ज़रा-सा खटा होते ही जागते हैं. तब भगत उठा, अपनी लकड़ी उठा ली, और धीरे से किवाड़ खोले.
बुढ़िया ने पूछा—कहां जाते हो?
‘कहीं नहीं, देखता था कि कितनी रात है.’
‘अभी बहुत रात है, सो जाओ.’
‘नींद, नहीं आती.’
‘नींद काहे आवेगी? मन तो चड्ढा के घर पर लगा हुआ है.’
‘चड्ढा ने मेरे साथ कौन-सी नेकी कर दी है, जो वहां जाऊं? वह आ कर पैरों पड़े, तो भी न जाऊं.’
‘उठे तो तुम इसी इरादे से ही?’
‘नहीं री, ऐसा पागल नहीं हूं कि जो मुझे कांटे बोये, उसके लिए फूल बोता फिरूं.’
बुढ़िया फिर सो गई. भगत ने किवाड़
मेरे साथ कौन-सी नेकी कर दी है, जो वहां जाऊं? वह आ कर पैरों पड़े, तो भी न जाऊं.’
‘उठे तो तुम इसी इरादे से ही?’
‘नहीं री, ऐसा पागल नहीं हूं कि जो मुझे कांटे बोये, उसके लिए फूल बोता फिरूं.’
बुढ़िया फिर सो गई. भगत ने किवाड़ लगा दिए और फिर आकर बैठा. पर उसके मन की कुछ ऐसी दशा थी, जो बाजे की आवाज़ कान में पड़ते ही उपदेश सुनने वालों की होती हैं. आंखें चाहे उपेदेशक की ओर हों; पर कान बाजे ही की ओर होते हैं. दिल में भी बापे की ध्वनि गूंजती रहती है. शर्म के मारे जगह से नहीं उठता. निर्दयी प्रतिघात का भाव भगत के लिए उपदेशक था, पर हृदय उस अभागे युवक की ओर था, जो इस समय मर रहा था, जिसके लिए एक-एक पल का विलम्ब घातक था.
न जाओगे? हमने जो सुना था, सो कह दिया.’
‘अच्छा किया—अच्छा किया. कलेजा ठंडा हो गया, आंखें ठंडी हो गईं. लड़का भी ठंडा हो गया होगा! तुम जाओ. आज चैन की नींद सोऊंगा. (बुढ़िया से) ज़रा तम्बाकू ले ले! एक चिलम और पीऊंगा. अब मालूम होगा लाला को! सारी साहबी निकल जाएगी, हमारा क्या बिगड़ा. लड़के के मर जाने से कुछ राज तो नहीं चला गया? जहां छ: बच्चे गए थे, वहां एक और चला गया, तुम्हारा तो राज सुना हो जाएगा. उसी के वास्ते सबका गला दबा-दबा कर जोड़ा था न. अब क्या करोगे? एक बार देखने जाऊंगा; पर कुछ दिन बाद मिजाज का हाल पूछूंगा.’
आदमी चला गया. भगत ने किवाड़ बन्द कर लिए, तब चिलम पर तम्बाखू रख कर पीने लगा.
बुढ़िया ने कहा—इतनी रात गए जाड़े-पाले में कौन जाएगा?
‘अरे, दोपहर ही होता तो मैं न जाता. सवारी दरवाज़े पर लेने आती, तो भी न जाता. भूल नहीं गया हूं. पन्ना की सूरत आंखों में फिर रही है. इस निर्दयी ने उसे एक नज़र देखा तक नहीं. क्या मैं न जानता था कि वह न बचेगा? ख़ूब जानता था. चड्ढा भगवान नहीं थे, कि उनके एक निगाह देख लेने से अमृत बरस जाता. नहीं, ख़ाली मन की दौड़ थी. अब किसी दिन जाऊंगा और कहूंगा—क्यों साहब, कहिए, क्या रंग है? दुनिया बुरा कहेगी, कहे; कोई परवाह नहीं. छोटे आदमियों में तो सब ऐब हैं. बड़ो में कोई ऐब नहीं होता, देवता होते हैं.’
भगत के लिए यह जीवन में पहला अवसर था कि ऐसा समाचार पा कर वह बैठा रह गया हो. अस्सी वर्ष के जीवन में ऐसा कभी न हुआ था कि सांप की ख़बर पाकर वह दौड़ न गया हो. माघ-पूस की अंधेरी रात, चैत-बैसाख की धूप और लू, सावन-भादों की चढ़ी हुई नदी और नाले, किसी की उसने कभी परवाह न की. वह तुरन्त घर से निकल पड़ता था—नि:स्वार्थ, निष्काम! लेन-देन का विचार कभी दिल में आया नहीं. यह सा काम ही न था. जान का मूल्य कौन दे सकता है? यह एक पुण्य-कार्य था. सैकड़ों निराशों को उसके मंत्रों ने जीवन-दान दे दिया था; पर आप वह घर से क़दम नहीं निकाल सका. यह ख़बर सुन कर सोने जा रहा है.
बुढ़िया ने कहा—तमाखू अंगीठी के पास रखी हुई है. उसके भी आज ढाई पैसे हो गए. देती ही न थी. बुढ़िया यह कह कर लेटी. बूढ़े ने कुप्पी बुझाई, कुछ देर खड़ा रहा, फिर बैठ गया. अन्त को लेट गया; पर यह ख़बर उसके हृदय पर बोझे की भांति रखी हुई थी. उसे मालूम हो रहा था, उसकी कोई चीज़ खो गई है, जैसे सारे कपड़े गीले हो गए है या पैरों में कीचड़ लगा हुआ है, जैसे कोई उसके मन में बैठा हुआ उसे घर से लिकालने के लिए कुरेद रहा है. बुढ़िया ज़रा देर में खर्राटे लेनी लगी. बूढ़े बातें करते-करते सोते है और ज़रा-सा खटा होते ही जागते हैं. तब भगत उठा, अपनी लकड़ी उठा ली, और धीरे से किवाड़ खोले.
बुढ़िया ने पूछा—कहां जाते हो?
‘कहीं नहीं, देखता था कि कितनी रात है.’
‘अभी बहुत रात है, सो जाओ.’
‘नींद, नहीं आती.’
‘नींद काहे आवेगी? मन तो चड्ढा के घर पर लगा हुआ है.’
‘चड्ढा ने मेरे साथ कौन-सी नेकी कर दी है, जो वहां जाऊं? वह आ कर पैरों पड़े, तो भी न जाऊं.’
‘उठे तो तुम इसी इरादे से ही?’
‘नहीं री, ऐसा पागल नहीं हूं कि जो मुझे कांटे बोये, उसके लिए फूल बोता फिरूं.’
बुढ़िया फिर सो गई. भगत ने किवाड़
मेरे साथ कौन-सी नेकी कर दी है, जो वहां जाऊं? वह आ कर पैरों पड़े, तो भी न जाऊं.’
‘उठे तो तुम इसी इरादे से ही?’
‘नहीं री, ऐसा पागल नहीं हूं कि जो मुझे कांटे बोये, उसके लिए फूल बोता फिरूं.’
बुढ़िया फिर सो गई. भगत ने किवाड़ लगा दिए और फिर आकर बैठा. पर उसके मन की कुछ ऐसी दशा थी, जो बाजे की आवाज़ कान में पड़ते ही उपदेश सुनने वालों की होती हैं. आंखें चाहे उपेदेशक की ओर हों; पर कान बाजे ही की ओर होते हैं. दिल में भी बापे की ध्वनि गूंजती रहती है. शर्म के मारे जगह से नहीं उठता. निर्दयी प्रतिघात का भाव भगत के लिए उपदेशक था, पर हृदय उस अभागे युवक की ओर था, जो इस समय मर रहा था, जिसके लिए एक-एक पल का विलम्ब घातक था.
उनके द्वार पर होता, तो भी बात न पूछता.’
‘तो न जाओगे? हमने जो सुना था, सो कह दिया.’
‘अच्छा किया—अच्छा किया. कलेजा ठंडा हो गया, आंखें ठंडी हो गईं. लड़का भी ठंडा हो गया होगा! तुम जाओ. आज चैन की नींद सोऊंगा. (बुढ़िया से) ज़रा तम्बाकू ले ले! एक चिलम और पीऊंगा. अब मालूम होगा लाला को! सारी साहबी निकल जाएगी, हमारा क्या बिगड़ा. लड़के के मर जाने से कुछ राज तो नहीं चला गया? जहां छ: बच्चे गए थे, वहां एक और चला गया, तुम्हारा तो राज सुना हो जाएगा. उसी के वास्ते सबका गला दबा-दबा कर जोड़ा था न. अब क्या करोगे? एक बार देखने जाऊंगा; पर कुछ दिन बाद मिजाज का हाल पूछूंगा.’
आदमी चला गया. भगत ने किवाड़ बन्द कर लिए, तब चिलम पर तम्बाखू रख कर पीने लगा.
बुढ़िया ने कहा—इतनी रात गए जाड़े-पाले में कौन जाएगा?
‘अरे, दोपहर ही होता तो मैं न जाता. सवारी दरवाज़े पर लेने आती, तो भी न जाता. भूल नहीं गया हूं. पन्ना की सूरत आंखों में फिर रही है. इस निर्दयी ने उसे एक नज़र देखा तक नहीं. क्या मैं न जानता था कि वह न बचेगा? ख़ूब जानता था. चड्ढा भगवान नहीं थे, कि उनके एक निगाह देख लेने से अमृत बरस जाता. नहीं, ख़ाली मन की दौड़ थी. अब किसी दिन जाऊंगा और कहूंगा—क्यों साहब, कहिए, क्या रंग है? दुनिया बुरा कहेगी, कहे; कोई परवाह नहीं. छोटे आदमियों में तो सब ऐब हैं. बड़ो में कोई ऐब नहीं होता, देवता होते हैं.’
भगत के लिए यह जीवन में पहला अवसर था कि ऐसा समाचार पा कर वह बैठा रह गया हो. अस्सी वर्ष के जीवन में ऐसा कभी न हुआ था कि सांप की ख़बर पाकर वह दौड़ न गया हो. माघ-पूस की अंधेरी रात, चैत-बैसाख की धूप और लू, सावन-भादों की चढ़ी हुई नदी और नाले, किसी की उसने कभी परवाह न की. वह तुरन्त घर से निकल पड़ता था—नि:स्वार्थ, निष्काम! लेन-देन का विचार कभी दिल में आया नहीं. यह सा काम ही न था. जान का मूल्य कौन दे सकता है? यह एक पुण्य-कार्य था. सैकड़ों निराशों को उसके मंत्रों ने जीवन-दान दे दिया था; पर आप वह घर से क़दम नहीं निकाल सका. यह ख़बर सुन कर सोने जा रहा है.
बुढ़िया ने कहा—तमाखू अंगीठी के पास रखी हुई है. उसके भी आज ढाई पैसे हो गए. देती ही न थी. बुढ़िया यह कह कर लेटी. बूढ़े ने कुप्पी बुझाई, कुछ देर खड़ा रहा, फिर बैठ गया. अन्त को लेट गया; पर यह ख़बर उसके हृदय पर बोझे की भांति रखी हुई थी. उसे मालूम हो रहा था, उसकी कोई चीज़ खो गई है, जैसे सारे कपड़े गीले हो गए है या पैरों में कीचड़ लगा हुआ है, जैसे कोई उसके मन में बैठा हुआ उसे घर से लिकालने के लिए कुरेद रहा है. बुढ़िया ज़रा देर में खर्राटे लेनी लगी. बूढ़े बातें करते-करते सोते है और ज़रा-सा खटा होते ही जागते हैं. तब भगत उठा, अपनी लकड़ी उठा ली, और धीरे से किवाड़ खोले.
बुढ़िया ने पूछा—कहां जाते हो?
‘कहीं नहीं, देखता था कि कितनी रात है.’
‘अभी बहुत रात है, सो जाओ.’
‘नींद, नहीं आती.’
‘नींद काहे आवेगी? मन तो चड्ढा के घर पर लगा हुआ है.’
‘चड्ढा ने मेरे साथ कौन-सी नेकी कर दी है, जो वहां जाऊं? वह आ कर पैरों पड़े, तो भी न जाऊं.’
‘उठे तो तुम इसी इरादे से ही?’
‘नहीं री, ऐसा पागल नहीं हूं कि जो मुझे कांटे बोये, उसके लिए फूल बोता फिरूं.’
बुढ़िया फिर सो गई. भगत ने किवाड़
मेरे साथ कौन-सी नेकी कर दी है, जो वहां जाऊं? वह आ कर पैरों पड़े, तो भी न जाऊं.’
‘उठे तो तुम इसी इरादे से ही?’
‘नहीं री, ऐसा पागल नहीं हूं कि जो मुझे कांटे बोये, उसके लिए फूल बोता फिरूं.’
बुढ़िया फिर सो गई. भगत ने किवाड़ लगा दिए और फिर आकर बैठा. पर उसके मन की कुछ ऐसी दशा थी, जो बाजे की आवाज़ कान में पड़ते ही उपदेश सुनने वालों की होती हैं. आंखें चाहे उपेदेशक की ओर हों; पर कान बाजे ही की ओर होते हैं. दिल में भी बापे की ध्वनि गूंजती रहती है. शर्म के मारे जगह से नहीं उठता. निर्दयी प्रतिघात का भाव भगत के लिए उपदेशक था, पर हृदय उस अभागे युवक की ओर था, जो इस समय मर रहा था, जिसके लिए एक-एक पल का विलम्ब घातक था.
उसने फिर किवाड़ खोले, इतने धीरे से कि बुढ़िया को ख़बर भी न हुई. बाहर निकल आया. उसी वक़्त गांव का चौकीदार गश्त लगा रहा था, बोला—कैसे उठे भगत? आज तो बड़ी सरदी है! कहीं जा रहे हो क्या?
भगत ने कहा—नहीं जी, जाऊंगा कहां! देखता था, अभी कितनी रात है. भला, कै बजे होंगे.
चौकीदार बोला—एक बजा होगा और क्या, अभी थाने से आ रहा था, तो डॉक्टर चड्ढा बाबू के बंगले पर बड़ी भीड़ लगी हुई थी. उनके लड़के का हाल तो तुमने सुना होगा, कीड़े ने छू लिया है. चाहे मर भी गया हो. तुम चले जाओ तो साइत बच जाय. सुना है, इस हज़ार तक देने को तैयार हैं.
भगत—मैं तो न जाऊं चाहे वह दस लाख भी दें. मुझे दस हज़ार या दस लाखे लेकर करना क्या हैं? कल मर जाऊंगा, फिर कौन भोगनेवाला बैठा हुआ है.
चौकीदार चला गया. भगत ने आगे पैर बढ़ाया. जैसे नशे में आदमी की देह अपने क़ाबू में नहीं रहती, पैर कहीं रखता है, पड़ता कहीं है, कहता कुछ है, जबान से निकलता कुछ है, वही हाल इस समय भगत का था. मन में प्रतिकार था; पर कर्म मन के अधीन न था. जिसने कभी तलवार नहीं चलाई, वह इरादा करने पर भी तलवार नहीं चला सकता. उसके हाथ कांपते हैं, उठते ही नहीं.
भगत लाठी खट-खट करता लपका चला जाता था. चेतना रोकती थी, पर उपचेतना ठेलती थी. सेवक स्वामी पर हावी था.
आधी राह निकल जाने के बाद सहसा भगत रुक गया. हिंसा ने क्रिया पर विजय पायी—मैं यों ही इतनी दूर चला आया. इस जाड़े-पाले में मरने की मुझे क्या पड़ी थी? आराम से सोया क्यों नहीं? नींद न आती, न सही; दो-चार भजन ही गाता. व्यर्थ इतनी दूर दौड़ा आया. चड्ढा का लड़का रहे या मरे, मेरी कला से. मेरे साथ उन्होंने ऐसा कौन-सा सलूक किया था कि मैं उनके लिए मरूं? दुनिया में हजारों मरते हैं, हजारों जीते हैं. मुझे किसी के मरने-जीने से मतलब! मगर उपचेतन ने अब एक दूसर रूप धारण किया, जो हिंसा से बहुत कुछ मिलता-जुलता था—वह झाड़-फूंक करने नहीं जा रहा है; वह देखेगा, कि लोग क्या कर रहे हें. डॉक्टर साहब का रोना-पीटना देखेगा, किस तरह सिर पीटते हें, किस तरह पछाड़े खाते है! वे लोग तो विद्वान होते हैं, सबर कर जाते होंगे! हिंसा-भाव को यों धीरज देता हुआ वह फिर आगे बढ़ा.
इतने में दो आदमी आते दिखाई दिए. दोनों बातें करते चले आ रहे थे—चड्ढा बाबू का घर उजड़ गया, वही तो एक लड़का था. भगत के कान में यह आवाज़ पड़ी. उसकी चाल और भी तेज़ हो गई. थकान के मारे पांव न उठते थे. शिरोभाग इतना बढ़ा जाता था, मानों अब मुंह के बल गिर पड़ेगा. इस तरह वह कोई दस मिनट चला होगा कि डॉक्टर साहब का बंगला नज़र आया. बिजली की बत्तियां जल रही थीं; मगर सन्नाटा छाया हुआ था. रोने-पीटने के आवाज़ भी न आती थी. भगत का कलेजा धक-धक करने लगा. कहीं मुझे बहुत देर तो नहीं हो गई? वह दौड़ने लगा. अपनी उम्र में वह इतना तेज़ कभी न दौड़ा था. बस, यही मालूम होता था, मानो उसके पीछे मौत दौड़ी आ री है.
डॉक्टर साहब ने झुक कर पूछा कैलाश, कैसी तबीयत है? कैलाश ने धीरे से हाथ उठा लिए; पर कुछ बोल न सका. मृणालिनी ने करूण स्वर में कहा—क्या जड़ी कुछ असर न करेंगी? डॉक्टर साहब ने सिर पकड़ कर कहा—क्या बतलाऊं, मैं इसकी बातों में आ गया. अब तो नश्तर से भी कुछ फ़ायदा न होगा.
आध घंटे तक यही हाल रहा. कैलाश की दशा प्रतिक्षण बिगड़ती जाती थी. यहां तक कि उसकी आंखें पथरा गई, हाथ-पांव ठंडे पड़ गए, मुख की कांति मलिन पड़ गई, नाड़ी का कहीं पता नहीं. मौत के सारे लक्षण दिखाई देने लगे. घर में कुहराम मच गया. मृणालिनी एक ओर सिर पीटने लगी; मां अलग पछाड़े खाने लगी. डॉक्टर चड्ढा को मित्रों ने पकड़ लिया, नहीं तो वह नश्तर अपनी गर्दन पर मार लेते.
एक महाशय बोले—कोई मंत्र झाड़ने वाला मिले, तो सम्भव है, अब भी जान बच जाय.
एक मुसलमान सज्जन ने इसका समर्थन किया—अरे साहब कब्र में पड़ी हुई लाशें ज़िंन्दा हो गई हैं. ऐसे-ऐसे बाकमाल पड़े हुए हैं.
डॉक्टर चड्ढा बोले—मेरी अक्ल पर पत्थर पड़ गया था कि इसकी बातों में आ गया. नश्तर लगा देता, तो यह नौबत ही क्यों आती. बार-बार समझाता रहा कि बेटा, सांप न पालो, मगर कौन सुनता था! बुलाइए, किसी झाड़-फूंक करने वाले ही को बुलाइए. मेरा सब कुछ ले ले, मैं अपनी सारी जायदाद उसके पैरों पर रख दूंगा. लंगोटी बांध कर घर से निकल जाऊंगा; मगर मेरा कैलाश, मेरा प्यारा कैलाश उठ बैठे. ईश्वर के लिए किसी को बुलवाइए.
एक महाशय का किसी झाड़ने वाले से परिचय था. वह दौड़कर उसे बुला लाये; मगर कैलाश की सूरत देखकर उसे मंत्र चलाने की हिम्मत न पड़ी. बोला—अब क्या हो सकता है, सरकार? जो कुछ होना था, हो चुका?
अरे मूर्ख, यह क्यों नही कहता कि जो कुछ न होना था, वह कहां हुआ? मां-बाप ने बेटे का सेहरा कहां देखा?
मृणालिनी का कामना-तरू क्या पल्लव और पुष्प से रंजित हो उठा? मन के वह स्वर्ण-स्वप्न जिनसे जीवन आनंद का स्रोत बना हुआ था, क्या पूरे हो गए? जीवन के नृत्यमय तारिका-मंडित सागर में आमोद की बहार लूटते हुए क्या उनकी नौका जलमग्न नहीं हो गई? जो न होना था, वह हो गया.
वही हरा-भरा मैदान था, वही सुनहरी चांदनी एक नि:शब्द संगीत की भांति प्रकृति पर छायी हुई थी; वही मित्र-समाज था. वही मनोरंजन के सामान थे. मगर जहां हास्य की ध्वनि थी, वहां करुण क्रन्दन और अश्रु-प्रवाह था.
पड़े थे, पर उन्हें तनिक भी दया न आयी थी. मैं तो
उनके द्वार पर होता, तो भी बात न पूछता.’
‘तो न जाओगे? हमने जो सुना था, सो कह दिया.’
‘अच्छा किया—अच्छा किया. कलेजा ठंडा हो गया, आंखें ठंडी हो गईं. लड़का भी ठंडा हो गया होगा! तुम जाओ. आज चैन की नींद सोऊंगा. (बुढ़िया से) ज़रा तम्बाकू ले ले! एक चिलम और पीऊंगा. अब मालूम होगा लाला को! सारी साहबी निकल जाएगी, हमारा क्या बिगड़ा. लड़के के मर जाने से कुछ राज तो नहीं चला गया? जहां छ: बच्चे गए थे, वहां एक और चला गया, तुम्हारा तो राज सुना हो जाएगा. उसी के वास्ते सबका गला दबा-दबा कर जोड़ा था न. अब क्या करोगे? एक बार देखने जाऊंगा; पर कुछ दिन बाद मिजाज का हाल पूछूंगा.’
आदमी चला गया. भगत ने किवाड़ बन्द कर लिए, तब चिलम पर तम्बाखू रख कर पीने लगा.
बुढ़िया ने कहा—इतनी रात गए जाड़े-पाले में कौन जाएगा?
‘अरे, दोपहर ही होता तो मैं न जाता. सवारी दरवाज़े पर लेने आती, तो भी न जाता. भूल नहीं गया हूं. पन्ना की सूरत आंखों में फिर रही है. इस निर्दयी ने उसे एक नज़र देखा तक नहीं. क्या मैं न जानता था कि वह न बचेगा? ख़ूब जानता था. चड्ढा भगवान नहीं थे, कि उनके एक निगाह देख लेने से अमृत बरस जाता. नहीं, ख़ाली मन की दौड़ थी. अब किसी दिन जाऊंगा और कहूंगा—क्यों साहब, कहिए, क्या रंग है? दुनिया बुरा कहेगी, कहे; कोई परवाह नहीं. छोटे आदमियों में तो सब ऐब हैं. बड़ो में कोई ऐब नहीं होता, देवता होते हैं.’
भगत के लिए यह जीवन में पहला अवसर था कि ऐसा समाचार पा कर वह बैठा रह गया हो. अस्सी वर्ष के जीवन में ऐसा कभी न हुआ था कि सांप की ख़बर पाकर वह दौड़ न गया हो. माघ-पूस की अंधेरी रात, चैत-बैसाख की धूप और लू, सावन-भादों की चढ़ी हुई नदी और नाले, किसी की उसने कभी परवाह न की. वह तुरन्त घर से निकल पड़ता था—नि:स्वार्थ, निष्काम! लेन-देन का विचार कभी दिल में आया नहीं. यह सा काम ही न था. जान का मूल्य कौन दे सकता है? यह एक पुण्य-कार्य था. सैकड़ों निराशों को उसके मंत्रों ने जीवन-दान दे दिया था; पर आप वह घर से क़दम नहीं निकाल सका. यह ख़बर सुन कर सोने जा रहा है.
बुढ़िया ने कहा—तमाखू अंगीठी के पास रखी हुई है. उसके भी आज ढाई पैसे हो गए. देती ही न थी. बुढ़िया यह कह कर लेटी. बूढ़े ने कुप्पी बुझाई, कुछ देर खड़ा रहा, फिर बैठ गया. अन्त को लेट गया; पर यह ख़बर उसके हृदय पर बोझे की भांति रखी हुई थी. उसे मालूम हो रहा था, उसकी कोई चीज़ खो गई है, जैसे सारे कपड़े गीले हो गए है या पैरों में कीचड़ लगा हुआ है, जैसे कोई उसके मन में बैठा हुआ उसे घर से लिकालने के लिए कुरेद रहा है. बुढ़िया ज़रा देर में खर्राटे लेनी लगी. बूढ़े बातें करते-करते सोते है और ज़रा-सा खटा होते ही जागते हैं. तब भगत उठा, अपनी लकड़ी उठा ली, और धीरे से किवाड़ खोले.
बुढ़िया ने पूछा—कहां जाते हो?
‘कहीं नहीं, देखता था कि कितनी रात है.’
‘अभी बहुत रात है, सो जाओ.’
‘नींद, नहीं आती.’
‘नींद काहे आवेगी? मन तो चड्ढा के घर पर लगा हुआ है.’
‘चड्ढा ने मेरे साथ कौन-सी नेकी कर दी है, जो वहां जाऊं? वह आ कर पैरों पड़े, तो भी न जाऊं.’
‘उठे तो तुम इसी इरादे से ही?’
‘नहीं री, ऐसा पागल नहीं हूं कि जो मुझे कांटे बोये, उसके लिए फूल बोता फिरूं.’
बुढ़िया फिर सो गई. भगत ने किवाड़
hey hey hey hey ah ha
subhaan allaah subhaan allah subhaan allah
subhaan allaah subhaan allah subhaan allah
valle valle
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chaand sifarish jo karta hamari deta woh tumko bata
sharm-o-haya pe parde gira ke karni hain hamko khata
zidd hain ab toh hain khud ko mitana hona hain tujhmein fanaa
chaand sifarish jo karta hamari deta woh tumko bata
sharm-o-haya pe parde gira ke karni hain hamko khata
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teri adaa bhi hain jhonke wali chhu ke gujar jaane de
teri lachak hain ke jaise daali dil mein utar jaane de
aaja baahon mein karke bahana hona hain tujhmein fanaa
chaand sifarish jo karta hamari deta woh tumko bata
sharm-o-haya pe parde gira ke karni hain hamko khata
subhaan allaah subhaan allah subhaan allah
subhaan allaah subhaan allah subhaan allah
hain jo iraaden bata doon tumko sharma hi jaaogi tum
dhadakanen jo suna doon tumko ghabraa hi jaaogi tum
hamko aata nahi hain chhupana hona hain tujhmein fanaa
chaand sifarish jo karta hamari deta woh tumko bata
sharm-o-haya pe parde gira ke karni hain hamko khata
zidd hain ab toh hain khud ko mitana hona hain tujhmein fanaa
संध्या का समय था. डॉक्टर चड्ढा गोल्फ़ खेलने के लिए तैयार हो रहे थे. मोटर द्वार के सामने खड़ी थी कि दो कहार एक डोली लिये आते दिखाई दिए. डोली के पीछे एक बूढ़ा लाठी टेकता चला आता था. डोली औषाधालय के सामने आकर रुक गई. बूढ़े ने धीरे-धीरे आकर द्वार पर पड़ी हुई चिक से झांका. ऐसी साफ-सुथरी ज़मीन पर पैर रखते हुए भय हो रहा था कि कोई घुड़क न बैठे. डॉक्टर साहब को खड़े देख कर भी उसे कुछ कहने का साहस न हुआ. डॉक्टर साहब ने चिक के अंदर से गरज कर कहा—कौन है? क्या चाहता है?
डॉक्टर साहब ने हाथ जोड़कर कहा—हुजूर बड़ा ग़रीब आदमी हूं. मेरा लड़का कई दिन से....
डॉक्टर साहब ने सिगार जला कर कहा—कल सबेरे आओ, कल सबेरे, हम इस वक़्त मरीजों को नहीं देखते.
बूढ़े ने घुटने टेक कर ज़मीन पर सिर रख दिया और बोला—दुहाई है सरकार की, लड़का मर जाएगा! हुजूर, चार दिन से आंखें नहीं....
डॉक्टर चड्ढा ने कलाई पर नज़र डाली. केवल दस मिनट समय और बाकी था. गोल्फ़-स्टिक खूंटी से उतारने हुए बोले—कल सबेरे आओ, कल सबेरे; यह हमारे खेलने का समय है.
बूढ़े ने पगड़ी उतार कर चौखट पर रख दी और रो कर बोला—हूजुर, एक निगाह देख लें. बस, एक निगाह! लड़का हाथ से चला जाएगा हुजूर, सात लड़कों में यही एक बच रहा है, हुजूर. हम दोनों आदमी रो-रोकर मर जाएंगे, सरकार! आपकी बढ़ती होय, दीनबंधु!
ऐसे उजड़ड देहाती यहां प्राय: रोज आया करते थे. डॉक्टर साहब उनके स्वभाव से ख़ूब परिचित थे. कोई कितना ही कुछ कहे; पर वे अपनी ही रट लगाते जाएंगे. किसी की सुनेंगे नहीं. धीरे से चिक उठाई और बाहर निकल कर मोटर की तरफ़ चले. बूढ़ा यह कहता हुआ उनके पीछे दौड़ा—सरकार, बड़ा धरम होगा. हुजूर, दया कीजिए, बड़ा दीन-दुखी हूं; संसार में कोई और नहीं है, बाबू जी!
मगर डॉक्टर साहब ने उसकी ओर मुंह फेर कर देखा तक नहीं. मोटर पर बैठ कर बोले—कल सबेरे आना.
मोटर चली गई. बूढ़ा कई मिनट तक मूर्ति की भांति निश्चल खड़ा रहा. संसार में ऐसे मनुष्य भी होते हैं, जो अपने आमोद-प्रमोद के आगे किसी की जान की भी परवाह नहीं करते, शायद इसका उसे अब भी विश्वास न आता था. सभ्य संसार इतना निर्मम, इतना कठोर है, इसका ऐसा मर्मभेदी अनुभव अब तक न हुआ था. वह उन पुराने जमाने की जीवों में था, जो लगी हुई आग को बुझाने, मुर्दे को कंधा देने, किसी के छप्पर को उठाने और किसी कलह को शांत करने के लिए सदैव तैयार रहते थे. जब तक बूढ़े को मोटर दिखाई दी, वह खड़ा टकटकी लगाए उस ओर ताकता रहा. शायद उसे अब भी डॉक्टर साहब के लौट आने की आशा थी. फिर उसने कहारों से डोली उठाने को कहा. डोली जिधर से आई थी, उधर ही चली गई. चारों ओर से निराश हो कर वह डॉक्टर चड्ढा के पास आया था. इनकी बड़ी तारीफ़ सुनी थी. यहां से निराश हो कर फिर वह किसी दूसरे डॉक्टर के पास न गया. क़िस्मत ठोक ली!
उसी रात उसका हंसता-खेलता सात साल का बालक अपनी बाल-लीला समाप्त करके इस संसार से सिधार गया. बूढ़े मां-बाप के जीवन का यही एक आधार था. इसी का मुंह देख कर जीते थे. इस दीपक के बुझते ही जीवन की अंधेरी रात भांय-भांय करने लगी. बुढ़ापे की विशाल ममता टूटे हुए हृदय से निकल कर अंधकार आर्त्त-स्वर से रोने लगी.
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दूर तलक है, सूना फ़लक अब ढूंढे तुझको कहाँ तू है किधर, ना आए नज़र आ सुन ले ये इल्तेजा मत जा रे मत जा, मत जा रे मत जा मत जा रे मत जा, मत जा रे मत जा तेरी कमी है, सांसें थमी है तन्हा है दिल मेरा दूर तलक है, सूना फ़लक अब ढूंढे तुझको कहाँ तू है किधर, ना आए नज़र आ सुन ले ये इल्तेजा मत जा रे मत जा, मत जा रे मत जा मत जा रे मत जा, मत जा रे मत जा तेरी कमी है, सांसें थमी है तन्हा है दिल मेरा.. ये कौन सा रिश्ता है मेरी आँखों से रिश्ता है ये कौन सा रिश्ता है मेरी आँखों से रिश्ता है दो दिल के पाटों में ये, बांटता है पिस्ता है दो दिल के पाटों में ये, बांटता है पिस्ता है ज़िद्द पे बस दिल को अपने तू ऐसे ना झुठला मत जा रे मत जा, मत जा रे मत जा मत जा रे मत जा, मत जा रे मत जा तेरी कमी है, सांसें थमी है तन्हा है दिल मेरा दिल इश्क़ से बिंधा है एक ज़िद्दी परिंदा है दिल इश्क़ से बिंधा है एक ज़िद्दी परिंदा है उम्मीदों से है घायल उम्मीद पे ज़िंदा है उम्मीदों से है घायल उम्मीद पे ज़िंदा है आस भरी अरदास को तू ऐसे ना ठुकरा मत जा रे मत जा, मत जा रे मत जा मत जा रे मत जा, मत जा रे मत जा तेरी कमी है, सांसें थमी है तन्हा है दिल मेरा..
संध्या का समय था. डॉक्टर चड्ढा गोल्फ़ खेलने के लिए तैयार हो रहे थे. मोटर द्वार के सामने खड़ी थी कि दो कहार एक डोली लिये आते दिखाई दिए. डोली के पीछे एक बूढ़ा लाठी टेकता चला आता था. डोली औषाधालय के सामने आकर रुक गई. बूढ़े ने धीरे-धीरे आकर द्वार पर पड़ी हुई चिक से झांका. ऐसी साफ-सुथरी ज़मीन पर पैर रखते हुए भय हो रहा था कि कोई घुड़क न बैठे. डॉक्टर साहब को खड़े देख कर भी उसे कुछ कहने का साहस न हुआ. डॉक्टर साहब ने चिक के अंदर से गरज कर कहा—कौन है? क्या चाहता है?
डॉक्टर साहब ने हाथ जोड़कर कहा—हुजूर बड़ा ग़रीब आदमी हूं. मेरा लड़का कई दिन से....
डॉक्टर साहब ने सिगार जला कर कहा—कल सबेरे आओ, कल सबेरे, हम इस वक़्त मरीजों को नहीं देखते.
बूढ़े ने घुटने टेक कर ज़मीन पर सिर रख दिया और बोला—दुहाई है सरकार की, लड़का मर जाएगा! हुजूर, चार दिन से आंखें नहीं....
डॉक्टर चड्ढा ने कलाई पर नज़र डाली. केवल दस मिनट समय और बाकी था. गोल्फ़-स्टिक खूंटी से उतारने हुए बोले—कल सबेरे आओ, कल सबेरे; यह हमारे खेलने का समय है.
बूढ़े ने पगड़ी उतार कर चौखट पर रख दी और रो कर बोला—हूजुर, एक निगाह देख लें. बस, एक निगाह! लड़का हाथ से चला जाएगा हुजूर, सात लड़कों में यही एक बच रहा है, हुजूर. हम दोनों आदमी रो-रोकर मर जाएंगे, सरकार! आपकी बढ़ती होय, दीनबंधु!
ऐसे उजड़ड देहाती यहां प्राय: रोज आया करते थे. डॉक्टर साहब उनके स्वभाव से ख़ूब परिचित थे. कोई कितना ही कुछ कहे; पर वे अपनी ही रट लगाते जाएंगे. किसी की सुनेंगे नहीं. धीरे से चिक उठाई और बाहर निकल कर मोटर की तरफ़ चले. बूढ़ा यह कहता हुआ उनके पीछे दौड़ा—सरकार, बड़ा धरम होगा. हुजूर, दया कीजिए, बड़ा दीन-दुखी हूं; संसार में कोई और नहीं है, बाबू जी!
मगर डॉक्टर साहब ने उसकी ओर मुंह फेर कर देखा तक नहीं. मोटर पर बैठ कर बोले—कल सबेरे आना.
मोटर चली गई. बूढ़ा कई मिनट तक मूर्ति की भांति निश्चल खड़ा रहा. संसार में ऐसे मनुष्य भी होते हैं, जो अपने आमोद-प्रमोद के आगे किसी की जान की भी परवाह नहीं करते, शायद इसका उसे अब भी विश्वास न आता था. सभ्य संसार इतना निर्मम, इतना कठोर है, इसका ऐसा मर्मभेदी अनुभव अब तक न हुआ था. वह उन पुराने जमाने की जीवों में था, जो लगी हुई आग को बुझाने, मुर्दे को कंधा देने, किसी के छप्पर को उठाने और किसी कलह को शांत करने के लिए सदैव तैयार रहते थे. जब तक बूढ़े को मोटर दिखाई दी, वह खड़ा टकटकी लगाए उस ओर ताकता रहा. शायद उसे अब भी डॉक्टर साहब के लौट आने की आशा थी. फिर उसने कहारों से डोली उठाने को कहा. डोली जिधर से आई थी, उधर ही चली गई. चारों ओर से निराश हो कर वह डॉक्टर चड्ढा के पास आया था. इनकी बड़ी तारीफ़ सुनी थी. यहां से निराश हो कर फिर वह किसी दूसरे डॉक्टर के पास न गया. क़िस्मत ठोक ली!
उसी रात उसका हंसता-खेलता सात साल का बालक अपनी बाल-लीला समाप्त करके इस संसार से सिधार गया. बूढ़े मां-बाप के जीवन का यही एक आधार था. इसी का मुंह देख कर जीते थे. इस दीपक के बुझते ही जीवन की अंधेरी रात भांय-भांय करने लगी. बुढ़ापे की विशाल ममता टूटे हुए हृदय से निकल कर अंधकार आर्त्त-स्वर से रोने लगी.
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कई साल गुज़र गए. डॉक्टर चड्ढा ने ख़ूब यश और धन कमाया; लेकिन इसके साथ ही अपने स्वास्थ्य की रक्षा भी की, जो एक साधारण बात थी. यह उनके नियमित जीवन का आर्शीवाद था कि पचास वर्ष की अवस्था में उनकी चुस्ती और फुर्ती युवकों को भी लज्जित करती थी. उनके हर एक काम का समय नियत था, इस नियम से वह जौ-भर भी न टलते थे. बहुधा लोग स्वास्थ्य के नियमों का पालन उस समय करते हैं, जब रोगी हो जाते हैं. डॉक्टर चड्ढा उपचार और संयम का रहस्य ख़ूब समझते थे. उनकी संतान-संध्या भी इसी नियम के अधीन थी. उनके केवल दो बच्चे हुए, एक लड़का और एक लड़की. तीसरी संतान न हुई, इसीलिए श्रीमती चड्ढा भी अभी जवान मालूम होती थीं. लड़की का तो विवाह हो चुका था. लड़का कॉलेज में पढ़ता था. वही माता-पिता के जीवन का आधार था. शील और विनय का पुतला, बड़ा ही रसिक, बड़ा ही उदार, विद्यालय का गौरव, युवक-समाज की शोभा. मुखमंडल से तेज की छटा-सी निकलती थी. आज उसकी बीसवीं सालगिरह थी.
संध्या का समय था. हरी-हरी घास पर कुर्सियां बिछी हुई थी. शहर के रईस और हुक्काम एक तरफ़, कॉलेज के छात्र दूसरी तरफ़ बैठे भोजन कर रहे थे. बिजली के प्रकाश से सारा मैंदान जगमगा रहा था. आमोद-प्रमोद का सामान भी जमा था. छोटा-सा प्रहसन खेलने की तैयारी थी. प्रहसन स्वयं कैलाशनाथ ने लिखा था. वही मुख्य ऐक्टर भी था. इस समय वह एक रेशमी कमीज पहने, नंगे सिर, नंगे पांव, इधर से उधर मित्रों की आव भगत में लगा हुआ था. कोई पुकारता—कैलाश, ज़रा इधर आना; कोई उधर से बुलाता—कैलाश, क्या उधर ही रहोगे? सभी उसे छोड़ते थे, चुहलें करते थे, बेचारे को ज़रा दम मारने का अवकाश न मिलता था. सहसा एक रमणी ने उसके पास आकर पूछा—क्यों कैलाश, तुम्हारे सांप कहां हैं? ज़रा मुझे दिखा दो.
कैलाश ने उससे हाथ मिला कर कहा—मृणालिनी, इस वक़्त क्षमा करो, कल दिखा दूंगा.
मृणालिनी ने आग्रह किया—जी नहीं, तुम्हें दिखाना पड़ेगा, मैं आज नहीं मानने की. तुम रोज़ ‘कल-कल’ करते हो. मृणालिनी और कैलाश दोनों सहपाठी थे ओर एक-दूसरे के प्रेम में पगे हुए. कैलाश को सांपों के पालने, खेलाने और नचाने का शौक़ था. तरह-तरह के सांप पाल रखे थे. उनके स्वभाव और चरित्र की परीक्षा करता रहता था. थोड़े दिन हुए, उसने विद्यालय में ‘सांपों’ पर एक मार्के का व्याख्यान दिया था. सांपों को नचा कर दिखाया भी था! प्राणिशास्त्र के बड़े-बड़े पंडित भी यह व्याख्यान सुन कर दंग रह गए थे! यह विद्या उसने एक बड़े संपेरे से सीखी थी. सांपों की जड़ी-बूटियां जमा करने का उसे मरज था. इतना पता भर मिल जाय कि किसी व्यक्ति के पास कोई अच्छी जड़ी है, फिर उसे चैन न आता था. उसे लेकर ही छोड़ता था. यही व्यसन था. इस पर हज़ारों रुपए फूंक चुका था. मृणालिनी कई बार आ चुकी थी; पर कभी सांपों को देखने के लिए इतनी उत्सुक न हुई थी. कह नहीं सकते, आज उसकी उत्सुकता सचमुच जाग गई थी, या वह कैलाश पर उपने अधिकार का प्रदर्शन करना चाहती थी; पर उसका आग्रह बेमौक़ा था. उस कोठरी में कितनी भीड़ लग जाएगी, भीड़ को देख कर सांप कितने चौकेंगें और रात के समय उन्हें छेड़ा जाना कितना बुरा लगेगा, इन बातों का उसे ज़रा भी ध्यान न आया.
कैलाश ने कहा—नहीं, कल ज़रूर दिखा दूंगा. इस वक़्त अच्छी तरह दिखा भी तो न सकूंगा, कमरे में तिल रखने को भी जगह न मिलेगी.
एक महाशय ने छेड़ कर कहा—दिखा क्यों नहीं देते, ज़रा-सी बात के लिए इतना टाल-मटोल कर रहे हो? मिस गोविंद, हर्गिज न मानना. देखें कैसे नहीं दिखाते!
दूसरे महाशय ने और रद्दा चढ़ाया—मिस गोविंद इतनी सीधी और भोली हैं, तभी आप इतना मिजाज करते हैं; दूसरे सुंदरी होती, तो इसी बात पर बिगड़ खड़ी होती.
तीसरे साहब ने मज़ाक उड़ाया—अजी बोलना छोड़ देती. भला, कोई बात है! इस पर आपका दावा है कि मृणालिनी के लिए जान हाजिर है.
मृणालिनी ने देखा कि ये शोहदे उसे रंग पर चढ़ा रहे हैं, तो बोली—आप लोग मेरी वकालत न करें, मैं खुद अपनी वकालत कर लूंगी. मैं इस वक़्त सांपों का तमाशा नहीं देखना चाहती. चलो, छुट्टी हुई.
इस पर मित्रों ने ठट्टा लगाया. एक साहब बोले—देखना तो आप सब कुछ चाहें, पर दिखाए भी तो?
कैलाश को मृणालिनी की झेंपी हुई सूरत को देखकर मालूम हुआ कि इस वक़्त उनका इनकार वास्तव में उसे बुरा लगा है. ज्यों ही प्रीति-भोज समाप्त हुआ और गाना शुरू हुआ, उसने मृणालिनी और अन्य मित्रों को सांपों के दरबे के सामने ले जाकर महुअर बजाना शुरू किया. फिर एक-एक खाना खोलकर एक-एक सांप को निकालने लगा. वाह! क्या कमाल था! ऐसा जान पड़ता था कि वे कीड़े उसकी एक-एक बात, उसके मन का एक-एक भाव समझते हैं. किसी को उठा लिया, किसी को गरदन में डाल लिया, किसी को हाथ में लपेट लिया. मृणालिनी बार-बार मना करती कि इन्हें गर्दन में न डालों, दूर ही से दिखा दो. बस, ज़रा नचा दो. कैलाश की गरदन में सांपों को लिपटते देख कर उसकी जान निकली जाती थी. पछता रही थी कि मैंने व्यर्थ ही इनसे सांप दिखाने को कहा; मगर कैलाश एक न सुनता था. प्रेमिका के सम्मुख अपने सर्प-कला-प्रदर्शन का ऐसा अवसर पाकर वह कब चूकता! एक मित्र ने टीका की—दांत तोड़ डाले होंगे. कैलाश हंसकर बोला—दांत तोड़ डालना मदारियों का काम है. किसी के दांत नहीं तोड़ गए. कहिए तो दिखा दूं? कह कर उसने एक काले सांप को पकड़ लिया और बोला—’मेरे पास इससे बड़ा और ज़हरीला सांप दूसरा नहीं है, अगर किसी को काट ले, तो आदमी आनन-फानन में मर जाए. लहर भी न आए. इसके काटे पर मन्त्र नहीं. इसके दांत दिखा दूं?’
मृणालिनी ने उसका हाथ पकड़कर कहा—नहीं-नहीं, कैलाश, ईश्वर के लिए इसे छोड़ दो. तुम्हारे पैरों पड़ती हूं.
इस पर एक-दूसरे मित्र बोले—मुझे तो विश्वास नहीं आता, लेकिन तुम कहते हो, तो मान लूंगा.
कैलाश ने सांप की गरदन पकड़कर कहा—नहीं साहब, आप आंखों से देख कर मानिए. दांत तोड़कर वश में किया, तो क्या. सांप बड़ा समझदार होता हैं! अगर उसे विश्वास हो जाए कि इस आदमी से मुझे कोई हानि न पहुंचेगी, तो वह उसे हर्गिज न काटेगा.
मृणालिनी ने जब देखा कि कैलाश पर इस वक़्त भूत सवार है, तो उसने यह तमाशा न करने के विचार से कहा—अच्छा भाई, अब यहां से चलो. देखा, गाना शुरू हो गया है. आज मैं भी कोई चीज सुनाऊंगी. यह कहते हुए उसने कैलाश का कंधा पकड़ कर चलने का इशारा किया और कमरे से निकल गई; मगर कैलाश विरोधियों का शंका-समाधान करके ही दम लेना चाहता था. उसने सांप की गरदन पकड़ कर ज़ोर से दबाई, इतनी ज़ोर से दबाई कि उसका मुंह लाल हो गया, देह की सारी नसें तन गईं. सांप ने अब तक उसके हाथों ऐसा व्यवहार न देखा था. उसकी समझ में न आता था कि यह मुझसे क्या चाहते हैं. उसे शायद भ्रम हुआ कि मुझे मार डालना चाहते हैं, अतएव वह आत्मरक्षा के लिए तैयार हो गया.
कैलाश ने उसकी गर्दन ख़ूब दबा कर मुंह खोल दिया और उसके ज़हरीले दांत दिखाते हुए बोला—जिन सज्जनों को शक हो, आकर देख लें. आया विश्वास या अब भी कुछ शक है? मित्रों ने आकर उसके दांत देखें और चकित हो गए. प्रत्यक्ष प्रमाण के सामने सन्देह को स्थान कहां. मित्रों का शंका-निवारण करके कैलाश ने सांप की गर्दन ढीली कर दी और उसे ज़मीन पर रखना चाहा, पर वह काला गेहूंवन क्रोध से पागल हो रहा था. गर्दन नरम पड़ते ही उसने सिर उठा कर कैलाश की उंगली में ज़ोर से काटा और वहां से भागा. कैलाश की उंगली से टप-टप ख़ून टपकने लगा. उसने ज़ोर से उंगली दबा ली और उपने कमरे की तरफ़ दौड़ा. वहां मेज की दराज में एक जड़ी रखी हुई थी, जिसे पीस कर लगा देने से घतक विष भी रफू हो जाता था. मित्रों में हलचल पड़ गई. बाहर महफिल में भी खबर हुई. डॉक्टर साहब घबरा कर दौड़े. फ़ौरन उंगली की जड़ कस कर बांधी गई और जड़ी पीसने के लिए दी गई. डॉक्टर साहब जड़ी के कायल न थे. वह उंगली का डसा भाग नश्तर से काट देना चाहते, मगर कैलाश को जड़ी पर पूर्ण विश्वास था. मृणालिनी प्यानों पर बैठी हुई थी. यह ख़बर सुनते ही दौड़ी, और कैलाश की उंगली से
बरनऊं रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि
बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन कुमार
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर
जय कपीस तिहुं लोक उजागर
रामदूत अतुलित बल धामा
अंजनि पुत्र पवनसुत नामा
महाबीर बिक्रम बजरंगी
कुमति निवार सुमति के संगी
कंचन बरन बिराज सुबेसा
कानन कुंडल कुंचित केसा
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै
कांधे मूंज जनेऊ साजै
संकर सुवन केसरीनंदन
तेज प्रताप महा जग बन्दन
विद्यावान गुनी अति चातुर
राम काज करिबे को आतुर
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया
राम लखन सीता मन बसिया
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा
बिकट रूप धरि लंक जरावा
भीम रूप धरि असुर संहारे
रामचंद्र के काज संवारे
लाय सजीवन लखन जियाये
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा
नारद सारद सहित अहीसा
जम कुबेर दिगपाल जहां ते
कबि कोबिद कहि सके कहां ते
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा
राम मिलाय राज पद दीन्हा
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना
लंकेस्वर भए सब जग जाना
जुग सहस्र जोजन पर भानू
लील्यो ताहि मधुर फल जानू
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं
दुर्गम काज जगत के जेते
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते
राम दुआरे तुम रखवारे
होत न आज्ञा बिनु पैसारे
सब सुख लहै तुम्हारी सरना
तुम रक्षक काहू को डर ना
आपन तेज सम्हारो आपै
तीनों लोक हांक तें कांपै
भूत पिसाच निकट नहिं आवै
महाबीर जब नाम सुनावै
नासै रोग हरै सब पीरा
जपत निरंतर हनुमत बीरा
संकट तें हनुमान छुड़ावै
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै
सब पर राम तपस्वी राजा
तिन के काज सकल तुम साजा
और मनोरथ जो कोई लावै
सोइ अमित जीवन फल पावै
चारों जुग परताप तुम्हारा
है परसिद्ध जगत उजियारा
साधु संत के तुम रखवारे
असुर निकंदन राम दुलारे
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता
अस बर दीन जानकी माता
राम रसायन तुम्हरे पासा
सदा रहो रघुपति के दासा
तुम्हरे भजन राम को पावै
जनम-जनम के दुख बिसरावै
अन्तकाल रघुबर पुर जाई
जहां जन्म हरि भक्त कहाई
और देवता चित्त न धरई
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई
संकट कटै मिटै सब पीरा
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा
जै जै जै हनुमान गोसाईं
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं
जो सत बार पाठ कर कोई
छूटहि बंदि महा सुख होई
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा
होय सिद्धि साखी गौरीसा
तुलसीदास सदा हरि चेरा
कीजै नाथ हृदय मंह डेरा
कीजै नाथ हृदय मंह डेरा
पवन तनय संकट हरन मंगल मूरति रूप
राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप
मंगल मूल सुजान ।
कहत अयोध्यादास तुम,
देहु अभय वरदान ॥
॥ चौपाई ॥
जय गिरिजा पति दीन दयाला ।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके ।
कानन कुण्डल नागफनी के ॥
अंग गौर शिर गंग बहाये ।
मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे ।
छवि को देखि नाग मन मोहे ॥ 4
मैना मातु की हवे दुलारी ।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी ।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे ।
सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ ।
या छवि को कहि जात न काऊ ॥ 8
देवन जबहीं जाय पुकारा ।
तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥
किया उपद्रव तारक भारी ।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥
तुरत षडानन आप पठायउ ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥
आप जलंधर असुर संहारा ।
सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥ 12
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई ।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥
किया तपहिं भागीरथ भारी ।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं ।
सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥
वेद नाम महिमा तव गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥ 16
प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला ।
जरत सुरासुर भए विहाला ॥
कीन्ही दया तहं करी सहाई ।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा ।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥
सहस कमल में हो रहे धारी ।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥ 20
एक कमल प्रभु राखेउ जोई ।
कमल नयन पूजन चहं सोई ॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर ।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥
जय जय जय अनन्त अविनाशी ।
करत कृपा सब के घटवासी ॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै ।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥ 24
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो ।
येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो ।
संकट से मोहि आन उबारो ॥
मात-पिता भ्राता सब होई ।
संकट में पूछत नहिं कोई ॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी ।
आय हरहु मम संकट भारी ॥ 28
धन निर्धन को देत सदा हीं ।
जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥
अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी ।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥
शंकर हो संकट के नाशन ।
मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं ।
शारद नारद शीश नवावैं ॥ 32
नमो नमो जय नमः शिवाय ।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥
जो यह पाठ करे मन लाई ।
ता पर होत है शम्भु सहाई ॥
ॠनियां जो कोई हो अधिकारी ।
पाठ करे सो पावन हारी ॥
पुत्र हीन कर इच्छा जोई ।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥ 36
पण्डित त्रयोदशी को लावे ।
ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा ।
ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे ।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥
जन्म जन्म के पाप नसावे ।
अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥ 40
कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी ।
जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥
॥ दोहा ॥
नित्त नेम कर प्रातः ही,
पाठ करौं चालीसा ।
तुम मेरी मनोकामना,
पूर्ण करो जगदीश ॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु,
संवत चौसठ जान ।
अस्तुति चालीसा शिवहि,
पूर्ण कीन कल्याण ॥
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥१॥
जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥२॥
धराधरेन्द्रनंदिनीविलासबन्धुबन्धुर
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे(क्वचिच्चिदम्बरे) मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥
जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥४॥
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः ।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटक
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥५॥
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः ॥६॥
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके ।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥७॥
नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः ।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः ॥८॥
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥९॥
अगर्व सर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी
रसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम् ।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥१०॥
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस
द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः ॥११॥
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्
गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रव्रितिक: कदा सदाशिवं भजाम्यहम ॥१२॥
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन् ।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥१३॥
निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-
निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परिश्रय परं पदं तदङ्गजत्विषां चयः ॥१४॥
प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम् ॥१५॥
इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम् ।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् ॥१६॥
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शम्भुः ॥१७॥
इति श्रीरावण कृतम्
शिव ताण्डव स्तोत्रम्स म्पूर्णम्
वह सदैव के लिए पवित्र हो जाता है और महान गुरु शिव की भक्ति पाता है।
इस भक्ति के लिए कोई दूसरा मार्ग या उपाय नहीं है।
बस शिव का विचार ही भ्रम को दूर कर देता है।
सद्गुरु: रावण शिव का महान भक्त था, और उनके बारे में अनेक कहानियां प्रचलित हैं। एक भक्त को महान नहीं होना चाहिये लेकिन वह एक महान भक्त था। वह दक्षिण से इतनी लंबी दूरी तय कर के कैलाश आया- मैं चाहता हूँ कि आप बस कल्पना करें, इतनी लंबी दूरी चल के आना – और वो शिव की प्रशंसा में स्तुति गाने लगा। उसके पास एक ड्रम था, जिसकी ताल पर उसने तुरंत ही 1008 छंदों की रचना कर डाली, जिसे शिव तांडव स्तोत्र के नाम से जाना जाता है।
उसके संगीत को सुन कर शिव बहुत ही आनंदित व मोहित हो गये। रावण गाता जा रहा था, और गाने के साथ–साथ उसने दक्षिण की ओर से कैलाश पर चढ़ना शुरू कर दिया। जब रावण लगभग ऊपर तक आ गया, और शिव उसके संगीत में मंत्रमुग्ध थे, तो पार्वती ने देखा कि एक व्यक्ति ऊपर आ रहा था।
अब ऊपर, शिखर पर केवल दो लोगों के लिये ही जगह है। तो पार्वती ने शिव को उनके हर्षोन्माद से बाहर लाने की कोशिश की। वे बोलीं, "वो व्यक्ति बिल्कुल ऊपर ही आ गया है"।
अब ऊपर, शिखर पर केवल दो लोगों के लिये ही जगह है। तो पार्वती ने शिव को उनके हर्षोन्माद से बाहर लाने की कोशिश की। वे बोलीं, “वो व्यक्ति बिल्कुल ऊपर ही आ गया है”। लेकिन शिव अभी भी संगीत और काव्य की मस्ती में लीन थे। आखिरकार पार्वती उनको
Ye mere bachpan k time ka actually main apni baaji k saath gaati thi
tadap yeh ishk ki dil se kabhi nahi jati
ki jan de dekar bhi divangi nahi jati
najane woh kaunsi dunia hai woh mere rabba
jaha se lautke koyi sada nahi aati
ishk me toh har chij mit jati hai
bekrari bankar hame tadpati hai
yad yad yad, bus yad reh jati hai
yad yad yad, bus yad reh jati hai
ishk me toh har chij mit jati hai
ishk me toh har chij mit jati hai
bekrari bankar hame tadpati ha
bekrari bankar hame tadpati ha
yad yad yad, bus yad reh jati hai
yad yad yad, bus yad reh jati hai
woh teri yad woh teri yad yad
yad yad yad, bus yad reh jati hai
yad yad yad, bus yad reh jati hai
karke tanha yeh jindagani kyu gayi chhod ke kahani
abb yeh aansu piya naa jaye bin tere abb jiya naa jaye
dard se tutti meri sanse jakhm dil ka siya na jaye
dard se tutti meri sanse jakhm dil ka siya na jaye
aaja aaja meri wafa tujhe bulati hai
aaja aaja meri wafa tujhe bulati hai
yad yad yad, bus yad reh jati hai
yad yad yad bus yad reh jati hai
woh teri yad woh teri yad yad
yad yad yad, bus yad reh jati hai
yad yad yad bus yad reh jati hai
yad me dekho bana hai yeh hasin tajmahal
yad me koi likhe shamo sehar shokh ghajal
yad me dekho bana hai yeh hasin tajmahal
yad me koi likhe shamo sehar shokh ghajal
dil ke dariya me khilta hai khwabo ka kamal
yad aate hai hamesha woh gujre huye pal
tu nahi hai teri yade mujhe satati hai
tu nahi hai teri yade mujhe satati hai
yad yad yad, bus yad reh jati hai
yad yad yad, bus yad reh jati hai
ishk me toh har chij mit jati hai
bekrari bankar hame tadpati hai
ishk me toh har chij mit jati hai
bekrari bankar hame tadpati hai
yad yad yad, bus yad reh jati hai
yad yad yad, bus yad reh jati hai
woh teri yad woh teri yad yad
yad yad yad, bus yad reh jati hai
yad yad yad, bus yad reh jati hai
yad yad yad, bus yad reh jati hai
yad yad yad, bus yad reh jati hai
शहनाइयों की सदा कह रही है
ख़ुशी की मुबारक घड़ी आ गई है
सजी सुर्ख़ जोड़े में चाँद से दुल्हन
ज़मीं पे फलक से परी आ गयी है
दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है
दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है
दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है
दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है
दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है
पल भर में कैसे बदलते हैं रिश्ते
पल भर में कैसे बदलते हैं रिश्ते
अब तो हर अपना बेग़ाना लगता है
दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है
दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है
दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है
दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है
सात फेरों से बंधा जन्मों का ये बंधन
प्यार से जोड़ा है रब ने प्रीत का दामन
सात फेरों से बंधा जन्मों का ये बंधन
प्यार से जोड़ा है रब ने प्रीत का दामन
हैं नई रस्में, नई कसमें, नई उलझन
होंठ हैं खामोश लेकिन कह रही धड़कन
धड़कन-धड़कन, धड़कन-धड़कन
धड़कन-धड़कन, धड़कन-धड़कन
धड़कन, मेरी धड़कन, धड़कन, तेरी धड़कन
धड़कन, मेरी धड़कन, धड़कन, तेरी धड़कन
धड़कन, धड़कन, धड़कन, धड़कन
धड़कन, धड़कन, धड़कन, धड़कन, धड़कन
मेरी धड़कन, मेरी धड़कन
मुश्किल अश्कों को छुपाना लगता है
मुश्किल अश्कों को छुपाना लगता है
दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है
पल भर में कैसे बदलते हैं रिश्ते
अब तो हर अपना बेग़ाना लगता है
दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है
दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है
दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है
दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है
मैं तेरी बाहों के झूले में पली बाबुल
जा रही हूँ छोड़ के तेरी गली बाबुल
मैं तेरी बाहों के झूले में पली बाबुल
मैं तेरी बाहों के झूले में पली बाबुल
मैं तेरी बाहों के झूले में पली बाबुल
जा रही हूँ छोड़ के तेरी गली बाबुल
खूबसूरत ये ज़माने याद आएँगे
चाह के भी हम तुम्हे ना भूल पाएँगे
मुश्किल
मुश्किल-मुश्किल दामन को छुड़ाना लगता है
दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है
मुश्किल दामन को छुड़ाना लगता है
दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है
पल भर में कैसे बदलते हैं रिश्ते
अब तो हर अपना बेग़ाना लगता है
दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है
दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है
दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है
दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है
दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है
दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है
दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है
दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है
दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है
दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है
दुल्हे का सेहरा सुहाना लगता है
दुल्हन का तो दिल दीवाना लगता है
धड़कन-धड़कन, धड़कन-धड़कन
धड़कन-धड़कन, धड़कन, धड़कन-धड़कन
धड़कन-धड़कन, धड़कन-धड़कन
धड़कन-धड़कन, धड़कन, धड़कन-धड़कन